कर्नाटक की राजनीति में विधान परिषद (MLC) चुनाव के नतीजों ने ऐसा संदेश दिया है, जिसकी गूंज आने वाले विधानसभा चुनावों तक सुनाई दे सकती है। सात सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस ने अपने सभी पांच उम्मीदवारों को जिताकर न सिर्फ शानदार जीत दर्ज की, बल्कि विपक्षी खेमे में सेंध लगाकर भाजपा और जेडीएस की रणनीति को भी झटका दे दिया। सबसे बड़ी बात यह रही कि कांग्रेस को अपने संख्याबल से अधिक वोट मिले, जिसने क्रॉस वोटिंग की चर्चाओं को हकीकत में बदल दिया। मुख्यमंत्री बनने के बाद डीके शिवकुमार के लिए यह पहला बड़ा राजनीतिक इम्तिहान था, जिसमें उन्होंने अपनी संगठनात्मक पकड़ और राजनीतिक प्रबंधन क्षमता का दमदार प्रदर्शन किया।कर्नाटक MLC चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत !

कर्नाटक MLC चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत !

सात सीटों का चुनाव बना कांग्रेस की ताकत का प्रदर्शन

कर्नाटक विधान परिषद की सात सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस, भाजपा और जेडीएस के बीच सीधा मुकाबला था। नतीजों में कांग्रेस के पांचों उम्मीदवार-बी.के. हरिप्रसाद, बी.एस. शिवन्ना, पी.वी. मोहन, थिप्पनप्पा कामाकनूर और विनय कार्तिक-विजयी रहे। वहीं भाजपा के लिंगराज पाटिल और आर. रघु को जीत मिली, जबकि जेडीएस का एकमात्र उम्मीदवार गोविंदराजू चुनाव हार गया। यह परिणाम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि विधानसभा में बहुमत के बावजूद कांग्रेस को विपक्षी दलों के विधायकों का भी समर्थन मिलता दिखाई दिया। इससे यह चुनाव साधारण राजनीतिक मुकाबले से कहीं अधिक बड़ा शक्ति प्रदर्शन बन गया।

क्रॉस वोटिंग ने बदल दिया पूरा समीकरण

चुनाव की सबसे बड़ी कहानी क्रॉस वोटिंग रही। विधानसभा में कांग्रेस और उसके समर्थकों के पास जितने वोट थे, उसके मुकाबले पार्टी उम्मीदवारों को 11 अतिरिक्त वोट मिले। कांग्रेस को जहां लगभग 140 वोट मिलने की उम्मीद थी, वहीं उसके खाते में कुल 151 वोट पहुंचे। इससे साफ संकेत मिला कि भाजपा और जेडीएस के कुछ विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। भाजपा के नेता आर. अशोक ने भी स्वीकार किया कि उनकी पार्टी के कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है। वहीं जेडीएस को अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने से विपक्षी गठबंधन के भीतर असंतोष और गुटबाजी खुलकर सामने आ गई। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह सिर्फ चुनावी गणित नहीं, बल्कि विपक्ष के भीतर बढ़ती बेचैनी का भी संकेत है।

डीके शिवकुमार की पहली बड़ी राजनीतिक जीत

सिद्धारमैया के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले डीके शिवकुमार के लिए यह चुनाव किसी फ्लोर टेस्ट से कम नहीं था। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी नेतृत्व क्षमता और संगठन पर पकड़ को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं, लेकिन MLC चुनाव के नतीजों ने उन सभी सवालों का जवाब दे दिया। कांग्रेस न सिर्फ अपने सभी उम्मीदवारों को जिताने में सफल रही, बल्कि विपक्षी खेमे से अतिरिक्त वोट हासिल करने में भी कामयाब रही। यही वजह है कि पार्टी के भीतर इस जीत को शिवकुमार की रणनीतिक सफलता के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व भी इसे राज्य सरकार की स्थिरता और संगठन की मजबूती का प्रमाण मान रहा है।

2028 की राजनीति का ट्रेलर माने जा रहे हैं ये नतीजे

कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने इस जीत को ऐतिहासिक बताते हुए दावा किया कि राज्य सरकार की ‘पांच गारंटी’ योजनाओं पर विपक्षी दलों के विधायकों ने भी भरोसा जताया है। वहीं भाजपा और जेडीएस के लिए यह परिणाम चेतावनी की तरह देखा जा रहा है। सात सीटों के चुनाव में कांग्रेस का पांच सीटें जीतना और विपक्षी विधायकों का उसके पक्ष में मतदान करना यह संकेत देता है कि कर्नाटक की राजनीति में कांग्रेस फिलहाल मजबूत स्थिति में है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह चुनाव सिर्फ विधान परिषद की सात सीटों का फैसला नहीं था, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले बदलते राजनीतिक समीकरणों और विपक्ष की कमजोर पड़ती एकजुटता का ट्रेलर भी साबित हुआ है।