छोटे बच्चों का गुस्सा करना, जिद करना या अपनी बात मनवाने के लिए रोना सामान्य व्यवहार का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब बच्चा गुस्से में माता-पिता पर हाथ उठाने लगे, तो इस व्यवहार को केवल उम्र का असर मानकर नजरअंदाज करना सही नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में बच्चे को यह समझाना जरूरी है कि किसी दूसरे व्यक्ति को मारना स्वीकार्य व्यवहार नहीं है।
पेरेंटिंग एक्सपर्ट इशिता बी. सदाना के अनुसार, बच्चे की उम्र चाहे कम हो, माता-पिता को शुरुआत से ही स्पष्ट सीमाएं यानी बाउंड्री तय करनी चाहिए। बच्चे को यह समझ आना चाहिए कि गुस्सा होना अलग बात है, लेकिन गुस्से में किसी को मारना स्वीकार्य नहीं है।
पहला कदम: बच्चे को साफ शब्दों में बताएं कि मारना गलत है
पेरेंटिंग एक्सपर्ट का कहना है कि जब बच्चा माता-पिता पर हाथ उठाए तो सबसे पहले उसे स्पष्ट और छोटे शब्दों में बताया जाना चाहिए कि ऐसा व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। बच्चे को लंबी डांट देने या गुस्से में भाषण देने के बजाय सीधे कहा जा सकता है, “हिट नहीं करना है” या “किसी को मारना नहीं है।”
बच्चे की उम्र छोटी होने के बावजूद उसे सीमाओं की जानकारी देना जरूरी है। दो साल का बच्चा हो या 10 साल का, माता-पिता को यह स्पष्ट रखना चाहिए कि हाथ उठाना स्वीकार्य व्यवहार नहीं है।
बच्चे के मारने पर रोने की एक्टिंग न करें
एक्सपर्ट के अनुसार, ऐसी स्थिति में माता-पिता को बच्चे के सामने चोट लगने या रोने की नाटकीय प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए। उदाहरण के तौर पर बार-बार यह कहना कि “देखो, मुझे हर्ट किया” या “तुमने मुझे मार दिया” जैसी प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत लेकिन स्पष्ट तरीके से बच्चे को रोकना बेहतर है।
इसका मतलब यह नहीं है कि माता-पिता को चोट या दर्द को नजरअंदाज करना चाहिए। बात यह है कि बच्चे के सामने प्रतिक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे उसे स्पष्ट संदेश मिले कि किसी को मारना गलत है और इस व्यवहार की अनुमति नहीं है।
दूसरा कदम: बच्चा हाथ उठाए तो तुरंत थोड़ा पीछे हटें
पेरेंटिंग एक्सपर्ट की दूसरी सलाह यह है कि बच्चा मारने की कोशिश करे तो माता-पिता को तुरंत थोड़ा पीछे हट जाना चाहिए। इसका उद्देश्य बच्चे को सजा देना नहीं, बल्कि शारीरिक दूरी बनाकर उसे दोबारा मारने से रोकना है।
अगर बच्चा बार-बार हाथ उठा रहा है और माता-पिता केवल “नहीं बेटा” कहते रह जाते हैं, लेकिन बच्चे को रोकने के लिए कोई स्पष्ट कदम नहीं उठाते, तो बच्चे को सीमा समझने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए शब्दों के साथ व्यवहार में भी स्पष्टता जरूरी है।
गोद में हो तो बच्चे को नीचे उतार दें
यदि बच्चा माता-पिता की गोद में है और गुस्से में मार रहा है, तो एक्सपर्ट के मुताबिक उसे शांत तरीके से गोद से नीचे उतारा जा सकता है। इसके बाद माता-पिता थोड़ा पीछे हट सकते हैं ताकि बच्चा दोबारा हाथ न उठा सके।
यह कदम बच्चे को डराने या अपमानित करने के लिए नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य केवल यह बताना है कि मारने के बाद पहले जैसी स्थिति जारी नहीं रहेगी। बच्चे को शांत तरीके से समझाया जा सकता है कि गुस्सा होने पर अपनी बात बताना ठीक है, लेकिन किसी को मारना ठीक नहीं है।
बच्चे को डराने के बजाय सीमा समझाना जरूरी
बच्चे के हाथ उठाने पर माता-पिता का गुस्सा बढ़ना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन एक्सपर्ट ने सीमा तय करते समय शांत रहने पर जोर दिया है। बच्चे को डराने, धमकाने या अत्यधिक डांटने के बजाय स्पष्ट नियम बताना अधिक महत्वपूर्ण है।
माता-पिता का संदेश छोटा, स्पष्ट और लगातार एक जैसा होना चाहिए। उदाहरण के लिए, “तुम गुस्सा हो सकते हो, लेकिन मार नहीं सकते” जैसी बात बच्चे को भावना और व्यवहार के बीच अंतर समझाने में मदद कर सकती है।
हर बार एक जैसी प्रतिक्रिया से बच्चे को समझ आएगी सीमा
बच्चे व्यवहार से भी बहुत कुछ सीखते हैं। यदि एक दिन हाथ उठाने पर माता-पिता सख्ती से रोकते हैं और दूसरे दिन उसी व्यवहार को हंसकर या नजरअंदाज करके छोड़ देते हैं, तो बच्चे के लिए नियम स्पष्ट नहीं रहेगा।
इसलिए माता-पिता को कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे के हाथ उठाने पर हर बार शांत और स्पष्ट प्रतिक्रिया दी जाए। उसे बताया जाए कि मारना स्वीकार्य नहीं है और जरूरत पड़ने पर शारीरिक दूरी बनाई जाए।
गुस्सा गलत नहीं, लेकिन मारना स्वीकार्य नहीं
बच्चे के गुस्से को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है और न ही हर बार गुस्सा करना गलत माना जा सकता है। बच्चे कई बार अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते और इसी वजह से उनका व्यवहार आक्रामक हो सकता है।
ऐसी स्थिति में माता-पिता की भूमिका बच्चे को यह सिखाने की होती है कि गुस्सा आने पर दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं। वह अपनी बात बोलकर बता सकता है, रो सकता है, कुछ समय शांत रह सकता है या माता-पिता से मदद मांग सकता है, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति को मारना सही तरीका नहीं है।
बच्चों को बाउंड्री सिखाने में निरंतरता सबसे अहम
बच्चे को सीमा सिखाने का काम केवल एक बार समझाने से पूरा नहीं होता। छोटे बच्चों को एक ही बात कई बार समझानी पड़ सकती है। इसलिए माता-पिता को धैर्य रखते हुए हर बार उसी सीमा को स्पष्ट करना चाहिए।
यदि बच्चा मारने की कोशिश करता है तो शांत तरीके से उसे रोकना, स्पष्ट शब्दों में मना करना और जरूरत पड़ने पर दूरी बनाना इस प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। धीरे-धीरे बच्चे को यह समझ आने लगता है कि गुस्सा होने पर हाथ उठाना स्वीकार्य नहीं है।
