नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज कर इतिहास रचने वाले दीपांशु शौकीन ने चुनाव परिणाम के बाद अपने राजनीतिक रुख को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। जीत के बाद दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की तारीफ की, लेकिन साथ ही कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI की कार्यशैली और उसके कुछ नेताओं की जेन-जी को समझने की क्षमता पर सवाल उठाए। दीपांशु ने स्पष्ट किया कि फिलहाल उनका किसी राजनीतिक दल में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है।
‘मेरी जीत अकेले की नहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों की है’
दीपांशु शौकीन ने अपनी जीत को व्यक्तिगत उपलब्धि के बजाय दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के भरोसे का परिणाम बताया। ‘लल्लनटॉप’ को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई छात्रों की आवाज उठाने और उनके मुद्दों को सामने रखने के लिए थी। उन्होंने कहा कि छात्रों ने उन पर भरोसा जताया और आगे भी जहां विद्यार्थियों को उनकी जरूरत होगी, वहां वह उनके मुद्दों के लिए आवाज उठाते रहेंगे।
डूसू चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज करना इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि लंबे समय के बाद किसी स्वतंत्र उम्मीदवार ने छात्र संघ के प्रमुख पदों में से एक पर सफलता हासिल की। चुनाव परिणाम के बाद दीपांशु के बयान ने इस जीत को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चाओं को और बढ़ा दिया है।
राहुल गांधी को लेकर दीपांशु ने क्या कहा?
इंटरव्यू के दौरान जब दीपांशु से पूछा गया कि चुनाव जीतने के बाद NSUI या कांग्रेस से जुड़े नेताओं, जिनमें कन्हैया कुमार और विनोद जाखड़ जैसे नाम शामिल हैं, की ओर से उनसे संपर्क किया गया या नहीं, तो उन्होंने कहा कि उनकी किसी से बातचीत नहीं हुई है। इसी सवाल के जवाब में उन्होंने राहुल गांधी को लेकर अपनी राय भी रखी।
दीपांशु ने कहा कि राहुल गांधी देश के युवाओं के नेता हैं और वह जेन-जी को समझते हैं। उनके मुताबिक राहुल गांधी युवाओं और उनकी समस्याओं से जुड़े मुद्दों पर बात करते हैं। हालांकि, दीपांशु ने इसी संदर्भ में NSUI की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि राहुल गांधी की ओर से छात्रों के बीच उठाई जाने वाली आवाज NSUI तक उसी तरह नहीं पहुंच सकी।
NSUI के कुछ नेताओं पर उठाए सवाल
दीपांशु शौकीन ने कहा कि NSUI के कुछ नेता न तो जेन-जी को समझ सके और न ही उन लोगों को समझ पाए जो लगातार जेन-जी के बीच रहते हैं। उन्होंने संगठन के भीतर की राजनीति और नेतृत्व को लेकर भी अपनी बात रखी।
उनका कहना था कि जो नेता जेन-जी को नहीं समझ सकते, उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं संभालनी चाहिए। दीपांशु ने छात्रों की समस्याओं को समझने वाले और उनकी बात प्रभावी ढंग से सामने रखने वाले नेतृत्व में बदलाव की जरूरत की बात कही। उन्होंने कहा कि उनके भीतर छात्रों को समझने और उनकी बात रखने की यही क्षमता थी, जिसके कारण विद्यार्थियों ने उन पर भरोसा किया।
जीत के बाद कांग्रेस में जाने की चर्चा पर दिया साफ जवाब
डूसू चुनाव में जीत के बाद यह सवाल भी उठने लगा कि क्या दीपांशु शौकीन भविष्य में कांग्रेस या किसी अन्य राजनीतिक दल का हिस्सा बन सकते हैं। इस सवाल पर उन्होंने फिलहाल किसी भी तरह की राजनीतिक पार्टी में शामिल होने की संभावना से इनकार किया।
दीपांशु ने कहा कि अभी उनका किसी भी पार्टी में शामिल होने का कोई प्लान नहीं है। उन्होंने अपनी जीत का श्रेय छात्रों को देते हुए कहा कि उनकी जीत छात्रों की वजह से हुई है और इस संबंध में आगे का फैसला भी वह छात्रों पर छोड़ते हैं।
कांग्रेस नेताओं के फोन पर भी किया खुलासा
दीपांशु से यह भी पूछा गया कि चुनाव जीतने के बाद क्या कांग्रेस के किसी नेता ने उन्हें फोन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीत के बाद कांग्रेस के किसी नेता की ओर से उन्हें फोन नहीं आया। इस जवाब के बाद उनके भविष्य को लेकर लगाई जा रही राजनीतिक अटकलों पर फिलहाल विराम लगता दिखाई देता है, हालांकि उन्होंने भविष्य को लेकर कोई स्थायी राजनीतिक घोषणा नहीं की।
समर्थन को लेकर रौनक खत्री का भी किया जिक्र
इंटरव्यू में दीपांशु शौकीन से यह सवाल भी पूछा गया कि क्या रौनक खत्री उनके समर्थन में थे। इस पर उन्होंने कहा कि जो भी ताकत छात्रों के अधिकारों की बात करती है और गलत होते हुए नहीं देख सकती, वह उनके साथ थी।
दीपांशु ने कहा कि उन्हें लोगों के साथ-साथ राजनीतिक दलों से भी काफी समर्थन मिला। हालांकि, उन्होंने अपनी चुनावी जीत को किसी एक व्यक्ति या संगठन से जोड़ने के बजाय छात्रों के समर्थन और उनके भरोसे से जोड़ा।
निर्दलीय जीत के बाद राजनीतिक चर्चा तेज
डूसू चुनाव में दीपांशु शौकीन की निर्दलीय जीत ने छात्र राजनीति में स्वतंत्र उम्मीदवारों की भूमिका को लेकर चर्चा तेज कर दी है। एक तरफ उन्होंने राहुल गांधी के प्रति सकारात्मक टिप्पणी की है, वहीं दूसरी तरफ फिलहाल किसी राजनीतिक दल में शामिल होने से इनकार किया है। साथ ही NSUI के कुछ नेताओं की कार्यशैली पर उनके सवालों ने चुनाव के बाद की राजनीतिक बहस को नया मुद्दा दे दिया है।
दीपांशु के बयानों से इतना स्पष्ट है कि फिलहाल वह अपनी राजनीतिक पहचान को किसी पार्टी से जोड़ने के बजाय छात्रों से जुड़े मुद्दों और अपने निर्दलीय जनादेश पर जोर दे रहे हैं। डूसू चुनाव के बाद उनका यह रुख आगे छात्र राजनीति में किस तरह की बहस को जन्म देता है, यह आने वाले समय में सामने आएगा।
