
Source: News 18 Hindi
दिल्ली के AIIMS के डॉक्टरों ने सिर्फ चार महीने के एक बच्चे की फेफड़ों की बहुत मुश्किल सर्जरी सफलतापूर्वक की है। बच्चे को पैदा होने से पहले ही फेफड़ों की एक दुर्लभ बीमारी, कंजेनिटल पल्मोनरी एयरवे मालफॉर्मेशन (CPAM), का पता चल गया था। यह बीमारी बच्चे के दोनों फेफड़ों में थी।
डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बीमारी वाले हिस्से को हटाया जाए और फेफड़ों के स्वस्थ हिस्से को सुरक्षित रखा जाए। इसके लिए उन्होंने पूरा फेफड़ा निकालने के बजाय सिर्फ खराब हिस्से का ऑपरेशन किया। अच्छी बात यह रही कि सर्जरी के दो दिन बाद ही बच्चे को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
क्या होती है CPAM बीमारी?
CPAM एक ऐसी बीमारी है, जो बच्चे के जन्म से पहले ही हो जाती है। इसमें फेफड़ों का कुछ हिस्सा ठीक से नहीं बन पाता। उस जगह पर छोटी-छोटी थैलियां बन जाती हैं, जिससे फेफड़े का वह हिस्सा सही तरह से काम नहीं करता। अक्सर यह बीमारी एक ही फेफड़े में होती है, लेकिन इस बच्चे के दोनों फेफड़े प्रभावित थे। ऐसे में डॉक्टरों को इलाज के लिए बहुत सावधानी बरतनी पड़ी।
क्यों मुश्किल था ऑपरेशन?
फेफड़े कई छोटे-छोटे हिस्सों में बंटे होते हैं। डॉक्टरों के लिए पूरा हिस्सा निकालना आसान होता है, लेकिन सिर्फ खराब हिस्से को निकालना काफी मुश्किल काम है। ऐसा करते समय फेफड़ों की नसों और सांस की नलियों को बहुत संभालकर अलग करना पड़ता है। डॉक्टरों ने बच्चे के दाएं फेफड़े के निचले हिस्से का ऑपरेशन किया। यह हिस्सा फेफड़ों के सबसे मुश्किल हिस्सों में माना जाता है।
डॉक्टरों की टीम ने मिलकर किया इलाज
इस सर्जरी की अगुवाई AIIMS के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. विशेष जैन ने की। वहीं, एनेस्थीसिया विभाग के डॉक्टरों ने ऑपरेशन के दौरान बच्चे की सांस को सुरक्षित रखने के लिए खास तकनीक का इस्तेमाल किया। AIIMS के डॉक्टरों ने बताया कि इतनी छोटी उम्र के बच्चे की इस तरह की सर्जरी बहुत कम देखने को मिलती है। यह पूरी टीम की मेहनत और आधुनिक तकनीक की मदद से संभव हो पाया।
अभी बाकी है इलाज का एक और चरण
डॉक्टरों ने फिलहाल बच्चे के दाएं फेफड़े के प्रभावित हिस्से का ऑपरेशन किया है। हालांकि, बीमारी दोनों फेफड़ों में होने के कारण आने वाले महीनों में बच्चे के बाएं फेफड़े की भी सर्जरी की जाएगी। फिलहाल डॉक्टर बच्चे की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि फेफड़ों के स्वस्थ हिस्से को बचाने वाली इस तकनीक से बच्चे को भविष्य में सांस लेने में किसी तरह की परेशानी नहीं होगी और वह सामान्य जीवन जी सकेगा।
