
बाबरी मस्जिद विध्वंस और रणनीतिक संयम पर अपनी बात रखते कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद।Source : Chrome
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय अपनाई गई तत्कालीन केंद्र सरकार की रणनीति पर खुलकर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि कई बार सत्ता में रहते हुए लिए गए फैसलों का सही या गलत होना समय बीतने के बाद ही स्पष्ट होता है और बाबरी मस्जिद के मामले में अपनाया गया रणनीतिक संयम भी ऐसा ही एक फैसला हो सकता है।
किताब विमोचन कार्यक्रम में रखा अपना पक्ष
नई दिल्ली में लेखक और वकील जावेद गाया की पुस्तक 'Heartland Rising: The Making of Majoritarian India' के विमोचन कार्यक्रम में बोलते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि सरकारें उस समय उपलब्ध परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेती हैं। हालांकि, वर्षों बाद जब उन फैसलों को देखा जाता है तो कई बार लगता है कि दूसरे विकल्प भी अपनाए जा सकते थे।
बाबरी मस्जिद को फोड़े की तरह बताया
बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान तत्कालीन सरकार की भूमिका पर पूछे गए सवाल के जवाब में खुर्शीद ने कहा कि उस घटना को शरीर पर निकले फोड़े की तरह देखा जा सकता है। उनके मुताबिक उस समय हालात बेहद संवेदनशील थे और फैसले तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए लिए गए थे। लेकिन बाद में पीछे मुड़कर देखने पर संभावित गलतियां अधिक स्पष्ट दिखाई देती हैं।
रणनीतिक संयम' पर जताई शंका
उन्होंने कहा कि उस दौर में यह माना गया था कि संयम बरतने से हालात और ज्यादा नहीं बिगड़ेंगे। लेकिन बाद में यह भी महसूस हुआ कि इसी नीति ने उन ताकतों को आगे बढ़ने का अवसर दे दिया, जिन्हें समय रहते रोका जा सकता था। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस और 2002 के गुजरात दंगों जैसी घटनाओं का मूल्यांकन समय बीतने के साथ अधिक स्पष्ट रूप से किया जा सकता है।
विभाजन का भी दिया उदाहरण
सलमान खुर्शीद ने भारत के विभाजन का जिक्र करते हुए कहा कि आज कई लोग उस समय के नेताओं के फैसलों पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना था कि इतिहास को बाद में देखकर फैसलों की आलोचना करना आसान होता है, लेकिन जब कोई सरकार संकट के दौर में होती है तो उसे तत्काल उपलब्ध हालात के आधार पर ही निर्णय लेने पड़ते हैं।
उत्तर प्रदेश को बताया राजनीतिक बदलाव का केंद्र
उन्होंने कहा कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक यदि भारत को फिर से लोकतांत्रिक और बहुलतावादी मूल्यों की दिशा में आगे बढ़ना है तो इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में बदलाव या तो भाजपा के भीतर से आएगा या फिर उत्तर प्रदेश की गठबंधन राजनीति नया रास्ता दिखाएगी।
अपूर्वानंद ने भी रखे अपने विचार
कार्यक्रम में लेखक और शिक्षाविद अपूर्वानंद ने भी आजादी के बाद की राजनीति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सत्ता हासिल करने की राजनीति में कई दलों ने वैचारिक समझौते किए, जिसका असर देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा पर पड़ा। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि यह भारत के राष्ट्रीय चरित्र से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है, जिस पर आज भी विचार किए जाने की आवश्यकता है।
