अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर हुए अभी सिर्फ 10 दिन ही बीते थे कि दोनों देशों ने एक-दूसरे पर फिर से सैन्य हमले शुरू कर दिए। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष खत्म क्यों नहीं हो पा रहा है? सीजफायर के बावजूद होर्मुज स्ट्रेट में फिर तनाव बढ़ गया है, डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ईरान को कड़ी चेतावनी दे रहे हैं, जबकि ईरान भी साफ कह चुका है कि अगर सीजफायर का उल्लंघन हुआ तो बातचीत पूरी तरह बंद कर दी जाएगी। ऐसे हालात में खाड़ी क्षेत्र के लोगों की सामान्य जीवन में लौटने की उम्मीदों को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। फिलहाल अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि दोनों देश दोबारा सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमत हो गए हैं। हालांकि विशेषज्ञ इसे स्थायी समाधान नहीं, बल्कि केवल अस्थायी राहत मान रहे हैं। उनका कहना है कि खाड़ी क्षेत्र में एक बार फिर तनाव बढ़ चुका है और युद्ध दोबारा भड़कने की आशंका बनी हुई है।

P | Source: Aaj Tak

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नेगोशिएशन का दांव-पेंच

क्या मिडिल ईस्ट में जो कुछ हो रहा है, वह अप्रत्याशित है? इस सवाल पर नॉर्वे में भारत के पूर्व राजदूत और वर्तमान में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (IICA) में प्रोफेसर डॉ. बी. बाला भास्कर का कहना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।

उन्होंने बताया कि अमेरिका और ईरान ने शुरुआती समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं और दोनों देशों के बीच व्यापक समझौते के लिए 60 दिनों की बातचीत चल रही है। इसके बावजूद सैन्य झड़पें होना किसी भरोसे की कमी का संकेत नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में अक्सर अपनाई जाने वाली रणनीति का हिस्सा होता है। डॉ. भास्कर के मुताबिक, किसी भी वार्ता में बढ़त उसी पक्ष को मिलती है जिसकी स्थिति जमीनी लड़ाई में मजबूत दिखाई देती है। इसलिए दोनों देश बातचीत के समानांतर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं ताकि अंतिम समझौते के समय उनका पक्ष ज्यादा मजबूत रहे। उन्होंने कहा कि जब तक अंतिम समझौता नहीं हो जाता, तब तक दोनों पक्ष अपनी ताकत दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ेंगे। ऐसे में आने वाले लगभग 50 दिनों की बातचीत के दौरान भी सैन्य हमलों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा मुद्दा

विशेषज्ञों के अनुसार, हालिया तनाव के पीछे सबसे बड़ा कारण होर्मुज स्ट्रेट है। अमेरिकी प्रशासन मानता है कि यह जलमार्ग ईरान का सबसे प्रभावी रणनीतिक हथियार बन चुका है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का भी आकलन है कि ईरान के लिए होर्मुज का महत्व उसके परमाणु कार्यक्रम से भी अधिक हो गया है।

बताया जा रहा है कि वार्ता के दौरान अमेरिका ने ओमान के पास से एक वैकल्पिक समुद्री मार्ग विकसित करने की कोशिश की, ताकि होर्मुज पर ईरान की पकड़ कमजोर की जा सके। ईरान ने इसका विरोध करते हुए ओमान रूट पर एक कंटेनर जहाज को ड्रोन से निशाना बनाया। इसके बाद अमेरिका ने जवाबी हमला किया और फिर ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर पलटवार किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के सबसे बड़े रणनीतिक हथियार को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। सुपरपावर होने के बावजूद अमेरिका को युद्ध के मैदान में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, इसलिए वह हर हाल में होर्मुज पर ईरान के प्रभाव को कम करना चाहता है। इसी रणनीति ने मौजूदा तनाव को फिर से हवा दी है।

46 साल पुराना है संघर्ष

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा तनाव केवल पिछले कुछ महीनों का नहीं है। दोनों देशों के बीच टकराव पिछले 46 वर्षों से जारी है। इसलिए यह उम्मीद करना कि सिर्फ दो महीने की बातचीत से स्थायी शांति स्थापित हो जाएगी, व्यावहारिक नहीं माना जा सकता। डॉ. बी. बाला भास्कर के अनुसार, इस वार्ता में केवल अमेरिका और ईरान ही नहीं, बल्कि लेबनान, इजरायल और पूरे क्षेत्र से जुड़े कई जटिल मुद्दे शामिल हैं। ऐसे में समाधान आसान नहीं होगा।

MoU की अस्पष्ट भाषा भी बनी विवाद की वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच हुए समझौते (MoU) की भाषा भी नए तनाव की बड़ी वजह बन रही है। द गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, समझौते में जानबूझकर कुछ बिंदुओं को अस्पष्ट रखा गया था, ताकि आगे की बातचीत में उन पर सहमति बनाई जा सके। लेकिन अब दोनों पक्ष उन्हीं शर्तों की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान में समझौते का समर्थन करने वाले लोग भी अब दबाव में हैं। वहां यह राय तेजी से मजबूत हो रही है कि ईरान को होर्मुज स्ट्रेट दोबारा खोलने के लिए सहमत नहीं होना चाहिए था। यह सोच केवल कट्टरपंथी नेताओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के अन्य वर्गों में भी फैल रही है।

बताया जा रहा है कि 14 बिंदुओं वाले इस MoU में लेबनान में सीजफायर और होर्मुज स्ट्रेट को खोलने जैसे दो सबसे विवादित मुद्दों पर जानबूझकर अस्पष्ट भाषा रखी गई थी। उम्मीद थी कि समय के साथ भरोसा बढ़ने पर दोनों देश किसी साझा समाधान पर पहुंच जाएंगे। लेकिन इसके उलट अब यही समझौता दबाव में टूटता दिखाई दे रहा है और दोनों पक्ष एक-दूसरे पर शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं। फिलहाल हर नई मिसाइल, हर नया हमला और हर नई चेतावनी वार्ता को और कमजोर करती दिखाई दे रही है। दोनों देश अपनी-अपनी रणनीति में लगे हैं और एक-दूसरे की बढ़त खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। मौजूदा हालात में ऐसा लग रहा है कि इस पूरी रणनीतिक बाजी का केंद्र होर्मुज स्ट्रेट बन चुका है, जबकि दांव पर पूरा खाड़ी क्षेत्र है।