1निकाह मुताह, जिसे प्लेजर मैरिज या अस्थायी विवाह भी कहा जाता है, यह लंबे समय से इस्लामी दुनिया के सबसे विवादित विषयों में गिना जाता है। यह एक ऐसा विवाह है जिसमें शादी से पहले ही पति पत्नी के रिश्ते की अवधि तय कर दी जाती है। यह अवधि कुछ घंटों, कुछ दिनों, महीनों या तय समय तक हो सकती है और समय पूरा होते ही यह निकाह समाप्त हो जाता है। इस व्यवस्था में तलाक की आवश्यकता नहीं होती लेकिन मेहर देना अनिवार्य माना जाता है। यह प्रथा मुख्य रूप से शिया मुस्लिम समुदाय में धार्मिक और कानूनी मान्यता रखती है जबकि सुन्नी मुस्लिम समुदाय इसे पूरी तरह अस्वीकार करता है। हाल के वर्षों में इस निकाह को लेकर कई तरह की बहसें तेज हुई हैं। समर्थक इसे धार्मिक परंपरा और आपसी सहमति पर आधारित व्यवस्था बताते हैं जबकि आलोचकों का कहना है कि कई जगह इसका इस्तेमाल महिलाओं के शोषण और अस्थायी शारीरिक संबंधों को वैध बनाने के लिए किया जाता है। खासकर कुछ देशों में विदेशी पर्यटकों द्वारा इसका कथित दुरुपयोग होने के आरोप भी समय समय पर सामने आते रहे हैं।

क्या है निकाह मुताह और कैसे होता है यह विवाह?

निकाह मुताह में विवाह से पहले ही दोनों पक्ष आपसी सहमति से यह तय कर लेते हैं कि यह रिश्ता कितनी अवधि तक चलेगा। विवाह के दौरान पुरुष के लिए महिला को तयशुदा मेहर देना अनिवार्य होता है। निर्धारित समय पूरा होने के बाद यह विवाह अपने आप समाप्त हो जाता है और किसी कानूनी तलाक की जरूरत नहीं होती।

यदि इस विवाह से संतान जन्म लेती है, तो इस्लामी कानून के अनुसार उसे वैध माना जाता है और उसे पिता की संपत्ति में कानूनी अधिकार भी प्राप्त होता है। समय के साथ कुछ देशों में निकाह मुताह के लिए मोबाइल ऐप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी सामने आए हैं, हालांकि कुल विवाहों की तुलना में इनकी संख्या काफी कम मानी जाती है।

किन देशों में प्रचलित है निकाह मुताह?

निकाह मुताह मुख्य रूप से शिया मुस्लिम समुदाय में धार्मिक और कानूनी मान्यता प्राप्त प्रथा है। इसके विपरीत सुन्नी मुस्लिम समुदाय इसे स्वीकार नहीं करता और इसे हराम मानता है।

सबसे अधिक यह प्रथा ईरान में देखने को मिलती है, जहां इसे ‘सीगेह’ के नाम से जाना जाता है और कानूनी मान्यता भी प्राप्त है। कई मामलों में इसका आधिकारिक पंजीकरण भी कराया जाता है।

इसके अलावा इराक, लेबनान के शिया बहुल क्षेत्रों, बहरीन, यमन, पाकिस्तान, भारत के कुछ शिया बहुल इलाकों और इंडोनेशिया में भी निकाह मुताह के मामले सामने आते रहे हैं। हालांकि सभी देशों में इसकी कानूनी स्थिति और सामाजिक स्वीकार्यता अलग-अलग है।

गरीब महिलाओं के शोषण का आरोप, परिवार भी रहते हैं असहज

निकाह मुताह को लेकर सबसे बड़ी आलोचना यह है कि इसका फायदा आर्थिक रूप से संपन्न लोग उठाते हैं, जबकि गरीब और कमजोर वर्ग की महिलाएं इसका शिकार बनती हैं। कई मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह व्यवस्था महिलाओं के शोषण का माध्यम बन सकती है।

यही वजह है कि शिया समुदाय के अधिकांश पारंपरिक परिवार भी अपनी कुंवारी बेटियों के लिए इस तरह के विवाह को स्वीकार नहीं करते। इसे परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि विधवा या तलाकशुदा महिलाओं के मामलों में कुछ परिवार अपेक्षाकृत अधिक लचीला रुख अपनाते हैं। कई बार युवक-युवती परिवार की जानकारी के बिना गुप्त रूप से भी निकाह मुताह कर लेते हैं।

टूरिस्ट भी उठाते हैं फायदा, धार्मिक पर्यटन पर उठे सवाल

कुछ देशों में विदेशी पर्यटक भी अपनी यात्रा के दौरान निकाह मुताह का सहारा लेते हैं। कई स्थानों पर विदेशी पुरुषों और स्थानीय महिलाओं के बीच ऐसे विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त है, लेकिन इसके लिए आधिकारिक पंजीकरण कराना आवश्यक होता है।

बताया जाता है कि यदि कोई जोड़ा होटल में ठहरता है, तो कई जगह उन्हें मुताहनामा (विवाह प्रमाण पत्र) दिखाना पड़ता है। ऐसा न करने पर स्थानीय धार्मिक कानूनों के तहत कार्रवाई भी हो सकती है।

हालांकि, इराक और सीरिया के कुछ धार्मिक स्थलों पर इस व्यवस्था के दुरुपयोग के आरोप भी सामने आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ विदेशी पर्यटक स्थानीय गरीब महिलाओं से कुछ दिनों के लिए निकाह मुताह कर संबंध बनाते हैं और फिर अपने देश लौट जाते हैं। ऐसी स्थिति में महिलाओं के पास मुआवजा मांगने या कानूनी सहायता पाने के सीमित विकल्प होते हैं। यदि इस विवाह से संतान जन्म लेती है, तो उसकी नागरिकता, पालन-पोषण और कानूनी अधिकारों से जुड़े कई जटिल सवाल भी खड़े हो जाते हैं।

निकाह मुताह पर क्यों होती है आलोचना?

दुनिया की लगभग 85 से 90 प्रतिशत मुस्लिम आबादी सुन्नी है और अधिकांश सुन्नी इस्लामी विद्वान निकाह मुताह को मान्यता नहीं देते। उनका मानना है कि इस्लाम में यह व्यवस्था समाप्त हो चुकी है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

वहीं, शिया समुदाय के भीतर भी इस विषय पर अलग-अलग मत हैं। कुछ धार्मिक विद्वान इसे धार्मिक रूप से वैध मानते हैं, जबकि कई परिवार इसे सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं मानते।

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यदि इस व्यवस्था का दुरुपयोग होता है, तो यह महिलाओं के अधिकारों और सम्मान पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। उनके अनुसार, स्थायी विवाह की सामाजिक जिम्मेदारियों के बजाय अस्थायी संबंधों को कानूनी रूप देने से महिलाओं के शोषण की आशंका बढ़ जाती है। दूसरी ओर, इस प्रथा के समर्थकों का तर्क है कि यह शिया धार्मिक परंपरा का हिस्सा है और यदि दोनों पक्षों की स्वतंत्र सहमति हो तो इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।