शाइस्ता आज़मी
क्रिसमस हर साल 25 दिसंबर को मनाया जाता है। यह दिन ईसा मसीह के जन्म की खुशी में मनाया जाता है। कहा जाता है कि ईसा मसीह का जन्म बेथलेहेम के एक छोटे से गाँव में हुआ था। उस ठंडी रात आकाश में एक बहुत ही चमकता हुआ सितारा दिखाई दिया, जो बाकी सितारों से अलग था। लोगों का मानना था कि यह कोई साधारण घटना नहीं है, बल्कि किसी महान आत्मा के जन्म का संकेत है।
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उस सितारे को देखकर दूर-दूर से गरीब चरवाहे, बुद्धिमान ज्ञानी और राजा उस नवजात शिशु के दर्शन के लिए आए। चरवाहे अपने साथ सादा-सा उपहार लाए, जबकि राजाओं ने सोना, लोबान और गंधरस जैसे कीमती उपहार चढ़ाए। यह दृश्य हमें सिखाता है कि ईश्वर की नजर में अमीर-गरीब सभी समान होते हैं।
कहा जाता है कि बचपन से ही ईसा मसीह बहुत दयालु और करुणामय थे। वे हमेशा जरूरतमंदों की मदद करते और लोगों को प्यार, क्षमा और शांति का रास्ता दिखाते थे। इसी कारण आज भी लोग क्रिसमस को प्रेम और भाईचारे के त्योहार के रूप में मनाते हैं।
आज के समय में क्रिसमस आते ही चारों ओर खुशी का माहौल बन जाता है। लोग अपने घरों और चर्चों को रंग-बिरंगी लाइटों, घंटियों, मोमबत्तियों और सुंदर क्रिसमस ट्री से सजाते हैं। बच्चे बड़े उत्साह से सांता क्लॉज़ का इंतजार करते हैं। माना जाता है कि सांता क्लॉज़ अच्छे बच्चों के लिए उपहार लाते हैं, जिससे बच्चों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।
एक छोटी-सी कहानी भी बहुत प्रसिद्ध है। एक बार क्रिसमस की रात एक गरीब बच्चा सड़क किनारे ठंड में बैठा था। उसके पास न तो नए कपड़े थे और न ही उपहार। तभी एक व्यक्ति ने उसे गर्म कपड़े और खाना दिया। बच्चे की आंखों में खुशी के आँसू आ गए। उसी पल उस व्यक्ति को एहसास हुआ कि असली क्रिसमस दूसरों को खुशी देने में है। यही संदेश ईसा मसीह ने दुनिया को दिया था।
पुराने समय से ही क्रिसमस पर गरीबों और जरूरतमंदों को खाना, कपड़े और उपहार देने की परंपरा रही है। आज भी लोग मिठाइयाँ बाँटते हैं, गीत गाते हैं, प्रार्थना करते हैं और अपने परिवार व दोस्तों के साथ समय बिताते हैं।
इसलिए क्रिसमस केवल सजावट, उपहार और पार्टी का त्योहार नहीं है, बल्कि यह हमें सिखाता है कि सच्ची खुशी दूसरों की मदद करने, प्यार बाँटने और शांति के साथ जीने में है।
