बिहार की राजनीति में स्वास्थ्य मंत्रालय एक बार फिर सत्ता, परिवारवाद और राजनीतिक उत्तराधिकार की बहस के केंद्र में आ गया है। सम्राट चौधरी सरकार के हालिया मंत्रिमंडल विस्तार में जनता दल यूनाइटेड प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को सीधे स्वास्थ्य मंत्री बनाए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू हो गई है। खास बात यह है कि निशांत कुमार अभी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं और राजनीति में उनकी सक्रिय एंट्री भी हाल के महीनों में ही हुई है। ऐसे में विपक्ष ही नहीं, राजनीतिक विश्लेषक भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या बिहार में स्वास्थ्य मंत्रालय अब “नेतापुत्रों” की राजनीतिक लॉन्चिंग का सबसे सुरक्षित और प्रभावशाली मंच बनता जा रहा है।
तेजप्रताप से शुरू हुई ‘स्वास्थ्य मंत्रालय’ की राजनीति
बिहार में स्वास्थ्य मंत्रालय और परिवारवाद की चर्चा पहली बार उस समय तेज हुई थी, जब वर्ष 2015 में महागठबंधन सरकार के दौरान राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को सीधे स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था। राजनीति में नए और प्रशासनिक अनुभव से दूर तेजप्रताप को इतना बड़ा विभाग सौंपे जाने पर उस समय भी भारी विवाद हुआ था। तेजप्रताप यादव के कार्यकाल में स्वास्थ्य व्यवस्था से ज्यादा राजनीतिक विवाद सुर्खियों में रहे। इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के डॉक्टरों और नर्सों की कथित रूप से लालू यादव के आवास पर ड्यूटी लगाए जाने का मामला काफी चर्चित रहा। विपक्ष ने तब आरोप लगाया था कि स्वास्थ्य विभाग को जनता की सेवा के बजाय राजनीतिक रसूख के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। अब लगभग एक दशक बाद वही तस्वीर नए चेहरे के साथ दोहराती दिखाई दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सवाल राष्ट्रीय जनता दल पर नहीं, बल्कि जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार पर उठ रहे हैं।
निशांत कुमार की एंट्री और ‘प्रयोग’ की चर्चा
निशांत कुमार लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए हुए थे। लेकिन हाल ही में जनता दल यूनाइटेड की सदस्यता लेने के बाद उनका सीधे मंत्री पद तक पहुंचना बिहार की राजनीति में बड़ा संकेत माना जा रहा है। सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में उन्हें स्वास्थ्य जैसा अहम विभाग सौंपा गया, जबकि इससे पहले भारतीय जनता पार्टी कोटे से यह जिम्मेदारी मंगल पांडेय संभाल रहे थे।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि स्वास्थ्य मंत्रालय ऐसा विभाग है, जहां काम दिखाने की संभावना सबसे अधिक होती है। अस्पताल, दवा, एंबुलेंस, डॉक्टर भर्ती और योजनाओं के जरिए सीधे गांव-गांव तक पहुंच बनाई जा सकती है। यही वजह है कि सत्ता पक्ष अक्सर ऐसे विभाग को उन चेहरों को सौंपता है, जिन्हें भविष्य का बड़ा नेता बनाना हो। निशांत कुमार के मामले में भी इसी रणनीति की चर्चा हो रही है। माना जा रहा है कि जनता दल यूनाइटेड अब नीतीश कुमार के बाद नेतृत्व की नई पीढ़ी को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है।
स्वास्थ्य विभाग क्यों बनता है सबसे अहम राजनीतिक मंच?
बिहार जैसे राज्य में स्वास्थ्य विभाग सिर्फ प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव का सबसे बड़ा माध्यम भी माना जाता है। राज्य के सबसे बड़े बजट वाले विभागों में शामिल स्वास्थ्य मंत्रालय का सीधा संपर्क आम जनता से होता है। गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर मेडिकल कॉलेज अस्पताल तक, हर स्तर पर इस विभाग की मौजूदगी रहती है। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो स्वास्थ्य सेवाओं में थोड़ा सा सुधार भी सरकार के लिए बड़ा जनसंपर्क हथियार बन सकता है। मुफ्त दवा, अस्पताल निर्माण, डॉक्टरों की नियुक्ति और इलाज की सुविधाएं जनता के बीच सरकार की छवि मजबूत करती हैं। लेकिन दूसरी ओर, यही विभाग सबसे ज्यादा आलोचना भी झेलता है। चमकी बुखार, कोरोना महामारी और अस्पतालों की बदहाल व्यवस्था जैसे मुद्दों ने कई सरकारों को कठघरे में खड़ा किया है। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक स्वास्थ्य मंत्रालय को “सबसे बड़ा अवसर और सबसे बड़ा जोखिम” दोनों मानते हैं।
क्या बिहार में परिवारवाद की नई पटकथा लिखी जा रही है?
निशांत कुमार के मंत्री बनने के बाद बिहार में एक बार फिर परिवारवाद की बहस तेज हो गई है। विपक्ष का आरोप है कि जिस राजनीति ने कभी परिवारवाद के खिलाफ खुद को खड़ा किया था, वही अब धीरे-धीरे उसी रास्ते पर चलती दिखाई दे रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बिहार की राजनीति में उत्तराधिकार की लड़ाई अब खुलकर सामने आने लगी है। राष्ट्रीय जनता दल में तेजस्वी और तेजप्रताप के बाद अब जनता दल यूनाइटेड में निशांत कुमार की सक्रिय एंट्री इसी बदलाव का संकेत मानी जा रही है। हालांकि सत्ता पक्ष इसे नई पीढ़ी की भागीदारी और राजनीतिक विस्तार बता रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार जैसे चुनौतीपूर्ण राज्य में स्वास्थ्य मंत्रालय को राजनीतिक प्रशिक्षण केंद्र बनाना सही रणनीति है, या फिर जनता को अनुभवी और प्रशासनिक समझ रखने वाले नेतृत्व की ज्यादा जरूरत है। आने वाले महीनों में निशांत कुमार के फैसले और स्वास्थ्य विभाग की स्थिति ही इस बहस का असली जवाब तय करेंगे।
