जनप्रतिनिधि का मतलब है जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि। पर जब कोई व्यक्ति चुनाव लड़े बिना, जनता की कसौटी पर परखे बिना, सीधे मंत्रिमंडल की कुर्सी पर बैठ जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है - क्या यह मंत्री पद की गरिमा को धूल में मिलाना नहीं है?

संवैधानिक छूट या लोकतांत्रिक छल?
संविधान का अनुच्छेद 164(4) और 75(5) कहता है कि कोई भी व्यक्ति मंत्री बन सकता है, बशर्ते 6 महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बन जाए। यह प्रावधान आपात स्थिति के लिए था - ताकि विशेषज्ञता वाले व्यक्ति को तुरंत सरकार में लाया जा सके। मगर आज यह प्रावधान 'पिछले दरवाजे' की राजनीति का लाइसेंस बन गया है।
जब हारी हुई विरासत, पूंजीपति का चंदा, या परिवार की वफादारी ही मंत्री बनने की योग्यता बन जाए, तो चुनाव का औचित्य ही क्या बचा? मतदाता 5 साल तक लाइन में लगकर जिसे हराता है, वही अगले दिन लाल बत्ती में घूमता दिखे - तो यह मतदाता के साथ खुला छलावा नहीं तो और क्या है?
मंत्री पद - जवाबदेही या पुरस्कार?
मंत्री का मतलब है नीति बनाना, जनता के पैसे का हिसाब देना, सदन में सवालों का सामना करना। जिसने एक वार्ड का चुनाव नहीं लड़ा, जो जनता की गाली-ताली से नहीं गुजरा, वह किसान की पीड़ा या बेरोजगार की मजबूरी कैसे समझेगा?
चुनाव हारने का डर ही लोकतंत्र में सबसे बड़ा अंकुश है। जब यह डर ही खत्म कर दिया जाए, जब मंत्री पद चुनावी हार का 'सांत्वना पुरस्कार' बन जाए, तो सत्ता निरंकुश हो जाती है। फिर नीतियां जनता के लिए नहीं, चंदे देने वालों के लिए बनती हैं।
गरिमा का क्षरण - अब तो अफसरशाही भी बैकडोर से
पहले मंत्री बनना तपस्या थी - सालों तक संगठन, आंदोलन, जेल और जनता के बीच काम। आज मंत्री बनना 'हाईकमान की कृपा' है। नतीजा? विधानसभा में मंत्री सवालों से भागते हैं, क्योंकि उन्हें पता है 6 महीने बाद राज्यसभा से या विधान परिषद से बैकडोर एंट्री हो जाएगी।
हद तो यह है कि अब IAS जैसी सबसे प्रतिष्ठित सेवा में भी 'लेटरल एंट्री' के नाम पर पिछले दरवाजे से अफसर बनाए जा रहे हैं। जिस UPSC की परीक्षा को पास करना लाखों युवाओं का सपना है, उस सिस्टम को ही दरकिनार कर कॉर्पोरेट घरानों से सीधे जॉइंट सेक्रेटरी बना दिए जा रहे हैं। जब नौकरशाही ही चुनाव और परीक्षा से बचकर कुर्सी पर बैठेगी, तो जनता की जवाबदेही किसके पास बचेगी? यह चलन अब आम हो गया है - मंत्री भी बैकडोर से, अफसर भी बैकडोर से। फिर लोकतंत्र कहां बचा?
जब IAS अफसर को भी UPSC पास करनी पड़ती है, जब चपरासी को भी परीक्षा देनी पड़ती है, तो करोड़ों के बजट पर दस्तखत करने वाले मंत्री को जनता की परीक्षा से क्यों छूट? क्या यही योग्यता का पैमाना है?
बिहार: वंशवाद का नया अध्याय
इस लोकतांत्रिक छल की सबसे ताजा मिसाल बिहार है। नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को मंत्री पद की शपथ दिलाकर जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। वैसे यह कोई अकेले नहीं हैं जिन्होंने न चुनाव लड़ा, न संगठन में पसीना बहाया, न जनता के सुख-दुख में शामिल हुए - फिर सीधे मंत्री बना दिए गए हैं?
यह सख्त विरोध का विषय है। बिहार की जनता लालू-राबड़ी के 'जंगलराज' और 'परिवारवाद' के खिलाफ पहले ही फैसला सुना चुकी है। अब अगर वही परिवारवाद NDA के बैनर तले फिर से थोपा जाएगा, तो यह मतदाता के साथ दगाबाजी है। क्या बिहार में योग्य कार्यकर्ताओं का अकाल पड़ गया है कि नेताओं के बेटे ही कुर्सी के हकदार हैं? निशांत कुमार और कुशवाहा-पुत्र को मंत्री बनाना बिहार के करोड़ों युवाओं के सपनों का अपमान होगा, जो दिन-रात मेहनत करके भी पंचायत सदस्य नहीं बन पाते।
समाधान क्या है?
अगर विशेषज्ञता ही चाहिए तो मंत्री की जगह 'सलाहकार' बनाया जाए, जिसके पास नीति बनाने का अधिकार तो हो पर कैबिनेट वोट न हो। और अगर मंत्री बनाना ही है तो 6 महीने की मोहलत खत्म हो। शपथ लेने से पहले चुनाव जीतकर आओ। लेटरल एंट्री की आड़ में भाई-भतीजावाद बंद हो।
ब्रिटेन में भी 'हाउस ऑफ लॉर्ड्स' से मंत्री बनते हैं, पर वहां की परंपरा अलग है। भारत में जहाँ 90 करोड़ मतदाता हैं, वहाँ बिना चुनाव के सत्ता देना लोकतंत्र का अपमान है।
लोकतंत्र सिर्फ सरकार बनाने का नाम नहीं, जनता के भरोसे का नाम है। जब बिना जनादेश के मंत्री बनेंगे, तो कल को बिना परीक्षा के डॉक्टर, बिना ट्रेनिंग के पायलट भी मांग उठेगी।
चुनाव से भागकर मंत्री बनना कायरता है, और ऐसी कायरता को संवैधानिक जामा पहनाना लोकतंत्र के साथ धोखा है। मतदाता सब देख रहा है। वह EVM का बटन दबाता है, पर उसकी चुप्पी को सहमति मत समझिए। जिस दिन उसका भरोसा टूटा, उस दिन कुर्सी भी नहीं बचेगी।
मंत्री पद मंदिर है, इसे पिछवाड़े की सीढ़ी मत बनाइए। लोकतंत्र में जनता ही मालिक है - मालिक को बाईपास करके नौकर नहीं बना करते। और बिहार की जनता तो खासकर वंशवाद को कभी माफ नहीं करेगी।
