मुंबई की दिंडोशी सेशंस कोर्ट के एक फैसले ने 12 साल पुराने गैंगरेप और POCSO मामले को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जिस शख्स ने एक दशक से ज्यादा वक्त जेल में बिताया, उसे अब अदालत ने सबूतों के अभाव में बाइज्जत बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि पुलिस जांच में गंभीर खामियां थीं, पीड़िता के बयानों में कई विरोधाभास थे और मेडिकल सबूत भी आरोपों को निर्णायक रूप से साबित नहीं कर सके। यह मामला सिर्फ एक आरोपी के बरी होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि अगर जांच मजबूत होती तो क्या नतीजा अलग हो सकता था? और अगर आरोपी बेगुनाह था तो उसके 12 साल कौन लौटाएगा?


कैसे सामने आया मामला?

पूरा मामला साल 2014 का है। मुंबई के पश्चिमी उपनगर में रहने वाली एक विधवा महिला ने दहिसर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी। महिला के चार बच्चे थे, जिनमें उसकी 11 वर्षीय बेटी भी शामिल थी। शिकायत के मुताबिक, लड़की ने घटना से करीब एक महीने पहले अपने निजी अंगों में दर्द होने की बात कही थी। परिवार ने शुरुआत में इसे गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि लड़की को हाल ही में मासिक धर्म शुरू हुआ था। 31 अक्टूबर 2014 को महिला जब तय समय से पहले घर लौटी तो उसकी बेटी घर पर नहीं मिली। तलाश के दौरान लड़की एक पड़ोसी के घर में मिली, जहां कुछ अन्य लोग भी मौजूद थे। मां के पूछने पर बच्ची ने कथित तौर पर बताया कि उसे अश्लील वीडियो दिखाए जाते थे और उसके साथ यौन शोषण किया गया। साथ ही उसे धमकी दी जाती थी कि अगर उसने किसी को बताया तो गंभीर परिणाम होंगे।

इसके बाद पुलिस ने गैंगरेप, POCSO और अन्य गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया।


12 साल तक चला कानूनी संघर्ष

मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी लंबे समय तक जेल में रहा। अदालत में ट्रायल चलता रहा, लेकिन इस दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए जिन्होंने अभियोजन पक्ष के दावों को कमजोर कर दिया। आरोपी लगातार खुद को निर्दोष बताता रहा और कहता रहा कि उसे झूठा फंसाया गया है।


कोर्ट ने किन आधारों पर किया बरी?

दिंडोशी कोर्ट ने अपने फैसले में कई अहम बातें कही—

पीड़िता के बयान में विरोधाभास पुलिस और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए बयानों में कई अंतर पाए गए। अदालत ने कहा कि बयानों की असंगति मामले को कमजोर करती है।


FIR में देरी

अदालत ने माना कि शिकायत दर्ज कराने में काफी देरी हुई और इसका कोई ठोस कारण सामने नहीं आया। कोर्ट ने कहा कि गंभीर अपराधों में तत्काल FIR दर्ज होना महत्वपूर्ण माना जाता है।


उम्र से जुड़े रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं

पीड़िता की सही उम्र को लेकर अदालत के सामने स्पष्ट दस्तावेज पेश नहीं किए गए। POCSO मामलों में यह बेहद अहम माना जाता है।


मोबाइल सबूत पेश नहीं किए गए

आरोप था कि लड़की को मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो दिखाए गए थे, लेकिन पुलिस अदालत में मोबाइल डेटा या फॉरेंसिक रिपोर्ट पेश नहीं कर सकी।

मेडिकल रिपोर्ट पर कोर्ट की टिप्पणी ! मेडिकल जांच में हाइमन इंजरी का जिक्र किया गया था, लेकिन अदालत ने साफ कहा कि केवल इसी आधार पर यौन शोषण साबित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मेडिकल रिपोर्ट के साथ अन्य मजबूत और विश्वसनीय सबूत भी जरूरी होते हैं।


पुलिस जांच पर उठे सवाल

इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल जांच एजेंसियों पर उठ रहा है। अगर आरोप सही थे तो जांच इतनी कमजोर क्यों रही? और अगर जांच अधूरी थी तो आरोपी को इतने साल जेल में क्यों रहना पड़ा? कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि संवेदनशील मामलों में जल्दबाजी या लापरवाही दोनों ही न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।


न्याय व्यवस्था पर बड़ा सवाल

यह मामला दो बेहद गंभीर पक्ष सामने लाता है—

एक तरफ एक नाबालिग से कथित यौन अपराध का आरोप, दूसरी तरफ एक व्यक्ति का 12 साल जेल में बिताना और फिर बरी हो जाना। अदालत के फैसले ने साफ कर दिया कि गंभीर आरोपों में भी सिर्फ आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि मजबूत सबूत और निष्पक्ष जांच ही अदालत में टिकती है। मुंबई का यह मामला अब सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि जांच व्यवस्था और न्याय प्रक्रिया पर गंभीर बहस का कारण बन गया है।