भारत कभी जनसंख्या विस्फोट को लेकर चर्चा में रहता था, लेकिन अब देश की जनसांख्यिकीय तस्वीर तेजी से बदल रही है। भारत के डेमोग्राफिक इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। हाल ही में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की रिपोर्ट के अनुसार, देश की कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) घटकर 1.9 पर पहुंच गई है। इसका मतलब है कि एक महिला औसतन 1.9 बच्चों को जन्म दे रही है। यह आंकड़ा जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक 2.1 के स्तर से भी नीचे है।
क्यों घट रहा है फर्टिलिटी रेट?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। जहां पहले बड़े परिवार भारतीय संस्कृति का हिस्सा माने जाते थे, वहीं आज की युवा पीढ़ी बेहतर जीवन स्तर और क्वालिटी ऑफ लाइफ को प्राथमिकता दे रही है। बढ़ती महंगाई, घरों की कीमतों में इजाफा और बच्चों की शिक्षा पर बढ़ता खर्च भी परिवारों को कम बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
इसके अलावा महिलाओं की शिक्षा में वृद्धि, नौकरी और कॉर्पोरेट क्षेत्र में उनकी बढ़ती भागीदारी तथा शादी की बढ़ती उम्र भी प्रजनन दर में गिरावट के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
किन राज्यों में सबसे कम है फर्टिलिटी रेट?
भारत के भीतर फर्टिलिटी रेट को लेकर एक स्पष्ट क्षेत्रीय अंतर भी देखने को मिल रहा है। जहां उत्तर भारत के कुछ राज्यों में आबादी अब भी अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ रही है, वहीं दक्षिण भारत और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों में प्रजनन दर काफी नीचे पहुंच चुकी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में सबसे कम टोटल फर्टिलिटी रेट दिल्ली में 1.2 दर्ज किया गया है। इसके बाद तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल का स्थान है, जहां यह दर 1.3 तक सिमट गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन राज्यों में शिक्षा का उच्च स्तर, महिलाओं का सशक्तिकरण और परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता प्रजनन दर में कमी के प्रमुख कारण हैं। वहीं दूसरी ओर बिहार में टोटल फर्टिलिटी रेट 2.9 और उत्तर प्रदेश में 2.6 दर्ज किया गया है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।
भविष्य की चुनौती
फर्टिलिटी रेट का 2.1 से नीचे जाना भविष्य में नई चुनौतियां भी खड़ी कर सकता है। यदि यह रुझान जारी रहा, तो आने वाले दशकों में देश में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ेगी और युवाओं की संख्या में कमी आएगी। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश पहले से ही ऐसी जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को समय रहते ऐसी नीतियां तैयार करनी होंगी जो आर्थिक विकास और जनसंख्या संतुलन के बीच सही तालमेल स्थापित कर सकें।
