मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े क्षेत्रीय संघर्ष के मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ महीनों से अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव अब केवल बयानबाजी या सीमित सैन्य कार्रवाई तक नहीं रह गया है। हालिया घटनाक्रम में ईरान द्वारा बहरीन और कुवैत की दिशा में बैलिस्टिक मिसाइलें दागे जाने और उसी दौरान इजरायल द्वारा लेबनान में सैन्य कार्रवाई किए जाने से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई है। खाड़ी देशों से लेकर भूमध्यसागरीय क्षेत्र तक सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं और दुनिया की निगाहें इस संकट पर टिक गई हैं।
अमेरिका-ईरान टकराव ने खोला नया मोर्चा
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत उस समय हुई जब अमेरिकी सेना ने ईरान से जुड़े सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई की। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, ईरानी ड्रोन गतिविधियों को रोकने के लिए सैन्य अभियान चलाया गया, जिसमें कथित तौर पर कई ड्रोन और रडार सिस्टम को निशाना बनाया गया। ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताया और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी थी। कुछ ही घंटों बाद खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल हमलों की खबरें सामने आने लगीं। इससे यह स्पष्ट हो गया कि दोनों देशों के बीच तनाव अब सीधे सैन्य टकराव के चरण में प्रवेश कर चुका है।
बहरीन और कुवैत में गूंजे सायरन
ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दावा किया कि उसने क्षेत्र में मौजूद "दुश्मन के सैन्य ठिकानों" को निशाना बनाया। अमेरिकी और सहयोगी रक्षा तंत्र ने अधिकांश मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया, लेकिन इस घटना ने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है। बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े का मुख्यालय स्थित है, जबकि कुवैत लंबे समय से अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का अहम केंद्र रहा है। मिसाइल अलर्ट के बाद दोनों देशों में हवाई हमले के सायरन बजे, लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई और कई संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई। भले ही बड़े पैमाने पर नुकसान की पुष्टि नहीं हुई हो, लेकिन इस हमले ने यह दिखा दिया कि क्षेत्रीय संघर्ष अब सीधे खाड़ी देशों तक पहुंच चुका है।
लेबनान में इजरायल की कार्रवाई से बढ़ा तनाव
उधर, खाड़ी में मिसाइल संकट के बीच इजरायल और लेबनान सीमा पर भी हालात बिगड़ते दिखाई दिए। इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में एक सैन्य वाहन को निशाना बनाया, जिसमें लेबनानी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के मारे जाने की खबर सामने आई। लेबनानी सेना ने इसे गंभीर हमला बताया है, जबकि इजरायल का कहना है कि कार्रवाई सुरक्षा खतरों को देखते हुए की गई। हालांकि इजरायल और लेबनान के बीच औपचारिक युद्ध नहीं है, लेकिन हिज्बुल्लाह की मौजूदगी और ईरान के साथ उसके संबंधों के कारण यह इलाका लंबे समय से तनाव का केंद्र बना हुआ है। इस घटना ने आशंका बढ़ा दी है कि यदि हालात नहीं संभले तो संघर्ष कई मोर्चों पर फैल सकता है।
शांति वार्ता पटरी से उतरी, कूटनीति पर संकट
कुछ समय पहले तक उम्मीद जताई जा रही थी कि बैक-चैनल बातचीत और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के जरिए तनाव कम किया जा सकेगा, लेकिन हालिया घटनाओं ने उन उम्मीदों को लगभग खत्म कर दिया है। ईरान अमेरिकी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बता रहा है, जबकि अमेरिका अपने कदमों को सुरक्षा हितों से जोड़कर देख रहा है। दोनों पक्षों के बीच विश्वास की कमी इतनी बढ़ चुकी है कि किसी तत्काल समझौते की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई देती है। ईरान की ओर से आर्थिक प्रतिबंधों और जमे हुए धन को लेकर नई शर्तें रखी जा रही हैं, जबकि वॉशिंगटन का रुख कठोर बना हुआ है।
पूरी दुनिया की चिंता क्यों बढ़ गई है?
मध्य पूर्व केवल क्षेत्रीय राजनीति का केंद्र नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के आसपास किसी बड़े सैन्य संघर्ष का असर सीधे तेल बाजारों, वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है। यही कारण है कि ईरान की मिसाइल कार्रवाई और इजरायल-लेबनान तनाव को दुनिया केवल स्थानीय संघर्ष के रूप में नहीं देख रही। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में कोई बड़ा कूटनीतिक प्रयास नहीं हुआ, तो यह संकट पूरे क्षेत्र को लंबे समय तक अस्थिरता की ओर धकेल सकता है। फिलहाल खाड़ी से लेकर लेवांत तक एक ही सवाल गूंज रहा है- क्या यह सिर्फ चेतावनी है या किसी बड़े युद्ध की शुरुआत?
