भारतीय मीडिया कभी सत्ता से सवाल पूछने, घोटालों का पर्दाफाश करने और आम लोगों की आवाज़ उठाने के लिए जाना जाता था। लेकिन डिजिटल दौर में तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब टीवी स्क्रीन पर दिखने वाले कई चर्चित चेहरे न्यूज़रूम के साथ-साथ सोशल मीडिया की दुनिया में भी सक्रिय हैं। ट्रैवल व्लॉग, डांस रील्स, लग्जरी लोकेशन और लाइफस्टाइल कंटेंट आज उनकी डिजिटल पहचान का हिस्सा बन चुके हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें एबीपी (ABP) की न्यूज ऐंकर चित्रा त्रिपाठी, रेगिस्तान में कार पर धुरंधर गाने पर डांस करते हुए नजर आ रही है, चित्रा त्रिपाठी ने वीडियो खुद अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर कि है, फैंस काफी पसंद कर रहे हैं, लेकिन आम लोगों का सवाल है, की क्या देश का चौथा अब रील बनाने में व्यस्त है, क्या लोगों के आम मुद्दों से दूर नजर आ रही है? वीडियो ने बहस को फिर से हवा दे दी। वीडियो में चर्चित मीडिया चेहरा रेगिस्तान के बीच लग्जरी एसयूवी के साथ संगीत की धुन पर झूमता दिखाई देता है। यह दृश्य देखने में आकर्षक हो सकता है, लेकिन इसके साथ कई असहज सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
देखें वीडियो-
https://www.instagram.com/reel/DZQwcXZSSlA/?igsh=MWNqbGl1Nm14ZWtoNQ==
देश की हकीकत और स्क्रीन की चमक
जिस समय सोशल मीडिया पर मनोरंजन और ग्लैमर से भरे वीडियो लाखों व्यूज़ बटोर रहे होते हैं, उसी समय देश का एक बड़ा वर्ग महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा होता है। करोड़ों युवा नौकरी की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। किसान मौसम और बाजार दोनों की मार झेल रहे हैं। छोटे शहरों और गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। ऐसे में जब जनता उन चेहरों को, जिन्हें वह पत्रकार और जनसरोकारों का प्रतिनिधि मानती है, मनोरंजनात्मक कंटेंट में देखती है तो एक वर्ग के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मीडिया की प्राथमिकताएं बदल रही हैं?
चौथे स्तंभ की बदलती परिभाषा
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है क्योंकि उससे उम्मीद की जाती है कि वह जनता और सत्ता के बीच एक जिम्मेदार पुल का काम करेगा। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में पत्रकार भी अब सिर्फ पत्रकार नहीं रह गए हैं; वे इंफ्लुएंसर, कंटेंट क्रिएटर और डिजिटल ब्रांड भी बनते जा रहे हैं। टीआरपी की जगह अब व्यूज़, लाइक्स और फॉलोअर्स ने ले ली है। यही वजह है कि खबर और मनोरंजन के बीच की रेखा पहले से कहीं ज्यादा धुंधली दिखाई देती है। आलोचकों का कहना है कि जब पत्रकारिता का चेहरा भी एल्गोरिदम की दौड़ में शामिल हो जाए, तो जनहित के मुद्दे पीछे छूटने का खतरा बढ़ जाता है।
निजी जिंदगी बनाम सार्वजनिक जिम्मेदारी
दूसरी तरफ यह तर्क भी दिया जाता है कि पत्रकार भी इंसान हैं और उन्हें अपनी निजी जिंदगी जीने का पूरा अधिकार है। किसी की यात्रा, शौक या मनोरंजन को उसकी पेशेवर क्षमता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता। यह तर्क अपनी जगह सही है। लेकिन बहस का असली केंद्र किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी नहीं, बल्कि वह सार्वजनिक छवि है जो करोड़ों लोगों के सामने पेश की जाती है। जब कोई व्यक्ति एक बड़े मीडिया संस्थान का प्रमुख चेहरा बन जाता है, तो उसकी हर सार्वजनिक गतिविधि स्वतः ही चर्चा और मूल्यांकन का विषय बन जाती है।
असली सवाल अब भी बाकी है
यह कहानी किसी एक वीडियो, एक एंकर या एक सोशल मीडिया पोस्ट की नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जो भारतीय मीडिया के भीतर चुपचाप चल रहा है। सवाल यह नहीं कि कोई पत्रकार डांस क्यों कर रहा है या घूम क्यों रहा है। सवाल यह है कि क्या उसी ऊर्जा और दृश्यता के साथ देश के बेरोजगार युवाओं, किसानों, छात्रों और आम नागरिकों की समस्याएं भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन रही हैं? क्योंकि लोकतंत्र में मीडिया की असली ताकत उसके ग्लैमरस वीडियो नहीं, बल्कि जनता के सवालों को सत्ता तक पहुंचाने की क्षमता होती है। और यही वह कसौटी है जिस पर अंततः हर दौर की पत्रकारिता को परखा जाएगा।
