पटना की ऐतिहासिक और विश्वविख्यात खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी को आखिरकार ऐसा नेतृत्व मिल गया है, जिसकी लंबे समय से प्रतीक्षा की जा रही थी। शिक्षा, शोध और उर्दू साहित्य की दुनिया में प्रतिष्ठित नाम माने जाने वाले प्रोफेसर मोहम्मद ज़ाहिदुल हक ने 1 जून 2026 को लाइब्रेरी के स्थायी निदेशक का पदभार ग्रहण कर लिया। यह नियुक्ति कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि पहली बार भारत सरकार ने उर्दू भाषा और साहित्य के किसी विशेषज्ञ को इस प्रतिष्ठित संस्था की कमान सौंपी है। साहित्यिक और शैक्षणिक जगत में इस फैसले का व्यापक स्वागत किया जा रहा है और इसे उर्दू भाषा के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
शिक्षा, शोध और साहित्य का लंबा सफर
प्रो. ज़ाहिदुल हक का शैक्षणिक सफर देश के दो प्रतिष्ठित संस्थानों-अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय-से शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग से अपने अकादमिक करियर की शुरुआत की और फिर कोलकाता विश्वविद्यालय से संबद्ध शिबपुर दीनोबन्धु कॉलेज में अपनी सेवाएं दीं। बाद में वे हैदराबाद विश्वविद्यालय से जुड़े, जहां उन्होंने अध्यापन, शोध और अकादमिक नेतृत्व के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया और प्रोफेसर के पद तक पहुंचे। शिक्षा जगत में उनकी पहचान केवल एक शिक्षक की नहीं, बल्कि ऐसे विद्वान की रही है जिसने उर्दू भाषा और साहित्य के गंभीर अध्ययनों को नई दिशा देने का कार्य किया।
कवि, आलोचक और शोधकर्ता के रूप में विशिष्ट पहचान
प्रो. ज़ाहिदुल हक उर्दू साहित्य में एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। वे एक संवेदनशील कवि होने के साथ-साथ गंभीर आलोचक और शोधकर्ता भी हैं। उनकी चर्चित कृतियों में ‘इनामुल्लाह खान यकीन: अहद और शायरी’, ‘बिसाते नक्द: तंकीदी मजामीन’ और ‘अठारहवीं सदी में उर्दू ग़ज़ल का फिक्री निजाम’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें शामिल हैं। इन रचनाओं को उर्दू साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वानों-प्रो. मुहम्मद हसन, प्रो. वहाब अशरफी, प्रो. इर्तज़ा करीम, प्रो. ग़ज़नफ़र अली और प्रो. सफ़दर इमाम कादरी-ने सराहा है। इसके अलावा उनके सौ से अधिक शोध लेख राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, जो उनके गहन अध्ययन और शोध क्षमता का प्रमाण हैं।
खुदा बख्श लाइब्रेरी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह नियुक्ति?
खुदा बख्श लाइब्रेरी केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों में से एक है। यहां संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियां, ऐतिहासिक दस्तावेज और हजारों पुरानी किताबें इसे शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के लिए अमूल्य केंद्र बनाती हैं। ऐसे संस्थान को ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो शोध और अकादमिक कार्यों की बारीकियों को समझता हो। पदभार संभालते ही प्रो. हक ने लाइब्रेरी के विभिन्न विभागों का निरीक्षण किया और अधिकारियों से कार्यप्रणाली की विस्तृत जानकारी ली। उनके अनुभव और दृष्टिकोण को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि लाइब्रेरी में डिजिटलीकरण, शोध गतिविधियों के विस्तार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान को और मजबूत करने की दिशा में नए कदम उठाए जाएंगे।
उर्दू जगत में उत्साह, भविष्य को लेकर बढ़ी उम्मीदें
निदेशक पद ग्रहण करने के बाद उर्दू भाषा और साहित्य से जुड़े शिक्षकों, छात्रों और शोधकर्ताओं ने प्रो. ज़ाहिदुल हक का स्वागत किया और उनके कार्यकाल को नई संभावनाओं का दौर बताया। पूर्व निदेशक-इन-चार्ज और नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने भी उन्हें शुभकामनाएं देते हुए संस्था के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। साहित्यिक हलकों का मानना है कि प्रो. हक का प्रशासनिक अनुभव, शोध के प्रति प्रतिबद्धता और उर्दू साहित्य की गहरी समझ खुदा बख्श लाइब्रेरी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद करेगी। यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक पहल के रूप में देखी जा रही है।
