किसी व्यक्ति की अचानक, संदिग्ध या असामान्य परिस्थितियों में मौत होने पर उसकी वास्तविक वजह जानने के लिए पोस्टमॉर्टम किया जाता है। मेडिकल भाषा में इसे ऑटोप्सी (Autopsy) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में विशेषज्ञ डॉक्टर, जिन्हें पैथोलॉजिस्ट कहा जाता है, शव की बाहरी और आंतरिक जांच करते हैं। शरीर के अलग-अलग अंगों और टिश्यू की स्थिति देखकर मौत के कारण और कई बार मौत के समय का भी अनुमान लगाया जाता है।
शरीर का हर अंग देता है अहम संकेत
मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, शरीर का हर अंग मौत से पहले की स्थिति के बारे में कुछ न कुछ जानकारी देता है। इसी वजह से पोस्टमॉर्टम के दौरान दिल, फेफड़े, दिमाग, लीवर, किडनी और अन्य अंगों की बारीकी से जांच की जाती है।
अगर दिल की धमनियों में ब्लॉकेज, सूजन या खून का थक्का मिलता है, तो इसे हार्ट अटैक की संभावना से जोड़कर देखा जाता है। वहीं फेफड़ों में पानी भरना, संक्रमण या जलन जैसे संकेत सांस रुकने, जहरीली गैस या फेफड़ों से जुड़ी बीमारी की तरफ इशारा कर सकते हैं।
फेफड़े बता सकते हैं डूबने से हुई मौत
पोस्टमॉर्टम में फेफड़ों की जांच बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। यदि किसी व्यक्ति की मौत डूबने से हुई हो, तो उसके फेफड़ों में पानी और डायटम (Diatom) नाम के सूक्ष्म जीव पाए जा सकते हैं। ये जीव सामान्य रूप से पानी में मौजूद होते हैं और डूबते समय सांस के साथ शरीर में पहुंच जाते हैं। इससे विशेषज्ञों को मौत की वजह समझने में मदद मिलती है।
दिमाग की जांच से मिलते हैं कई सुराग
ब्रेन की जांच भी पोस्टमॉर्टम का अहम हिस्सा होती है। यदि दिमाग में ब्लीडिंग, सूजन या चोट के निशान मिलते हैं, तो डॉक्टर इसे स्ट्रोक, सिर में गंभीर चोट या किसी बाहरी हमले से जोड़कर देखते हैं। कई मामलों में ब्रेन की स्थिति ही मौत की असली वजह का खुलासा करती है।
गला दबाने और फांसी के मामलों में कैसे होती है पहचान?
फोरेंसिक जांच में गले की स्थिति भी काफी अहम होती है। गला दबाने के मामलों में गर्दन की नसों और टिश्यू में नुकसान दिखाई देता है। इसके अलावा हायॉइड बोन (Hyoid Bone) पर दबाव या टूटने के निशान मिल सकते हैं।
वहीं फांसी के मामलों में रस्सी का निशान आमतौर पर ऊपर की ओर जाता दिखाई देता है। इन संकेतों के आधार पर विशेषज्ञ मौत के तरीके को समझने की कोशिश करते हैं।
पेट से भी मिल सकती है मौत के समय की जानकारी
पोस्टमॉर्टम के दौरान पेट में मौजूद भोजन की भी जांच की जाती है। भोजन पूरी तरह पचा है या अधपचा है, इसके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्ति ने आखिरी बार कब खाना खाया था। इससे मौत के संभावित समय का अंदाजा लगाने में मदद मिलती है।
जहर की आशंका होने पर सुरक्षित रखा जाता है विसरा
जब मौत का कारण तुरंत स्पष्ट नहीं होता या जहर देने का संदेह होता है, तो डॉक्टर विसरा सुरक्षित रखते हैं। इसमें आमतौर पर लीवर, किडनी, पेट और आंतों के नमूने शामिल होते हैं। इन सैंपल्स को लैब में भेजकर रासायनिक जांच की जाती है, जिससे जहरीले पदार्थ, ड्रग्स या अन्य खतरनाक रसायनों की मौजूदगी का पता लगाया जा सके।
सिर्फ देखकर नहीं तैयार होती रिपोर्ट
अक्सर लोगों को लगता है कि पोस्टमॉर्टम में केवल शरीर को देखकर ही मौत की वजह तय कर दी जाती है, लेकिन ऐसा नहीं है। कई मामलों में अंगों और टिश्यू के छोटे-छोटे सैंपल लेकर लैब में भेजे जाते हैं। माइक्रोस्कोप और केमिकल टेस्ट के जरिए बीमारी, संक्रमण, जहर या अंदरूनी नुकसान की जांच की जाती है। यही वजह है कि पोस्टमॉर्टम की अंतिम रिपोर्ट आने में कई दिन या कई हफ्तों का समय लग सकता है।
शरीर के छोटे निशान भी खोल सकते हैं बड़ा राज
विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर पर मौजूद चोट, खरोंच, नाखूनों का नीला पड़ना, त्वचा का रंग बदलना या गला दबाने के निशान जैसे संकेत जांच में बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। कई बार इन्हीं छोटे संकेतों के आधार पर मौत की पूरी कहानी सामने आ जाती है।
जलने के मामलों में भी मिलते हैं अहम सुराग
यदि किसी व्यक्ति का शव जला हुआ मिले, तो डॉक्टर यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि व्यक्ति जलते समय जीवित था या नहीं। अगर शरीर पर पानी वाले छाले मौजूद हों और खून में कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर अधिक मिले, तो माना जाता है कि व्यक्ति आग लगने के समय जीवित था।
वहीं अगर शरीर पर सूखे छाले हों, पैरों के तलवे सुरक्षित हों या अन्य परिस्थितियां संदिग्ध हों, तो यह संभावना भी जांची जाती है कि मौत पहले हुई और बाद में शव को जलाकर सबूत मिटाने की कोशिश की गई।
पुलिस जांच में अहम सबूत बनती है रिपोर्ट
पोस्टमॉर्टम पूरा होने के बाद पैथोलॉजिस्ट एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करते हैं। इसमें मौत की संभावित वजह, शरीर में मिले संकेत और लैब टेस्ट के नतीजे शामिल होते हैं। यही रिपोर्ट बाद में पुलिस जांच और अदालत में सबसे महत्वपूर्ण सबूतों में से एक मानी जाती है।
