सहारनपुर का मंगलवार सिर्फ एक प्रशासनिक दिन नहीं था, बल्कि वह राजनीति, कानून व्यवस्था और पीड़ित परिवार की न्याय की लड़ाई के बीच टकराव का दिन बन गया। कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन जसाला गांव के चर्चित मोनू कश्यप हत्याकांड में पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग लेकर डीआईजी कार्यालय पहुंचीं। उनके साथ मृतक की मां, कश्यप समाज के लोग और पार्टी समर्थक भी मौजूद थे। लेकिन कुछ ही देर में मामला सिर्फ ज्ञापन और मुलाकात तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आरोप-प्रत्यारोप और पुलिस कार्रवाई तक पहुंच गया। इकरा हसन का आरोप है कि वह पीड़ित परिवार की बात प्रशासन तक पहुंचाने गई थीं, लेकिन उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें कार्यालय से बाहर जाने को कहा गया। इसके बाद माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया और पुलिस तथा सांसद के बीच तीखी बहस शुरू हो गई।

“मुझे गिरफ्तार कर थाने में बैठाया गया”, सांसद ने लगाए गंभीर आरोप

घटनाक्रम ने उस समय नया मोड़ ले लिया, जब पुलिस सांसद को महिला थाने ले गई। इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें जबरन वहां बैठाया गया और यह एक तरह की गिरफ्तारी थी। हालांकि पुलिस ने इसे सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई बताया। महिला थाने के अंदर भी माहौल शांत नहीं रहा। वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने सांसद को पानी दिया, लेकिन उन्होंने इसे लेने से इनकार करते हुए भावुक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “हमें आपका पानी नहीं पीना है, एक मां का बेटा मर गया है और आप हमें पानी पिला रहे हैं।” यह बयान कुछ ही देर में सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया। करीब 10 मिनट तक थाने में बैठाए जाने के बाद उन्हें जाने दिया गया, लेकिन इस दौरान उनके समर्थकों का जमावड़ा थाने के बाहर बढ़ता गया।


महिला पुलिस अधिकारी से नोकझोंक और बढ़ता सियासी विवाद

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, विवाद उस समय और बढ़ गया जब एक महिला इंस्पेक्टर ने सांसद से वहां से चलने को कहा। इस दौरान इकरा हसन ने कहा कि उन्हें हाथ न लगाया जाए। जवाब में पुलिस अधिकारी ने कहा कि उन्होंने हाथ नहीं लगाया, केवल रास्ता दिखाया है। देखते ही देखते यह बहस प्रशासनिक संवाद से निकलकर राजनीतिक टकराव की तस्वीर बन गई। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में महिला थाने पहुंचने लगे। इसके बाद पुलिस ने पूर्व राज्यमंत्री मांगेराम कश्यप सहित कुछ अन्य लोगों को हिरासत में लिया और आगे की प्रक्रिया शुरू की।

आखिर क्या है मोनू कश्यप हत्याकांड, जिसने पूरे मामले को राजनीतिक रंग दे दिया?

इस पूरे विवाद की जड़ शामली जिले के कांधला थाना क्षेत्र के जसाला गांव का वह मामला है, जिसने स्थानीय स्तर से निकलकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी। 25 वर्षीय मोनू कश्यप 21 अप्रैल की रात पंजोखरा रेलवे लाइन के पास गंभीर हालत में मिला था। उसे पहले स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र और बाद में मेरठ रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। मृतक की मां ने मोनू के दोस्तों सचिन और शुभम पर हत्या का आरोप लगाया। जांच के दौरान कॉल डिटेल, मोबाइल लोकेशन और पूछताछ के आधार पर पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया। जांच में सामने आया कि मोनू की दो युवतियों से दोस्ती थी और इसी को लेकर पहले भी विवाद हो चुका था। पुलिस के अनुसार घटना वाली रात तीनों रेलवे ट्रैक के पास बैठे थे। वहीं विवाद बढ़ा और आरोप है कि गुस्से में मोनू को ट्रेन के सामने धक्का दे दिया गया।


पुलिस का पक्ष: “सड़क जाम करने की कोशिश हुई थी”

दूसरी ओर पुलिस प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम की अलग तस्वीर पेश की। एसपी सिटी व्योम बिंदल के मुताबिक सूचना मिली थी कि कुछ लोग डीआईजी कार्यालय के बाहर सड़क जाम करने की कोशिश कर रहे थे। कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के चलते पुलिस ने हस्तक्षेप किया और स्थिति को नियंत्रित किया। पुलिस का कहना है कि कार्रवाई नियमों के अनुसार की गई और जो लोग सार्वजनिक व्यवस्था बाधित करने की कोशिश कर रहे थे, उनके खिलाफ कानूनी कदम उठाए जाएंगे।

न्याय, राजनीति और सड़क के बीच फंसा सवाल

सहारनपुर की यह घटना अब सिर्फ एक हत्याकांड या एक सांसद की पुलिस से बहस तक सीमित नहीं रह गई है। यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि जब जनप्रतिनिधि पीड़ित परिवार के साथ खड़े होते हैं और प्रशासनिक कार्रवाई होती है, तो उसकी सीमा क्या होनी चाहिए? दूसरी ओर प्रशासन का तर्क है कि कानून व्यवस्था हर हाल में प्राथमिकता है। फिलहाल मोनू कश्यप हत्याकांड की जांच जारी है, लेकिन इसके इर्द-गिर्द खड़ा हुआ राजनीतिक और सामाजिक विवाद अभी थमता नहीं दिख रहा।