बिहार में राजनीतिक तापमान उस वक्त और बढ़ गया जब RJD के नेता और विपक्ष के प्रमुख तेजस्वी यादव ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि देश में बढ़ती महंगाई, रुपये की गिरती मजबूती और बेरोज़गारी को लेकर केंद्र के पास “कोई समाधान नहीं, सिर्फ़ महंगाई की मेलोडी है।” तेजस्वी के इस बयान ने सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा को जन्म दे दिया है। तेजस्वी ने कहा कि महंगाई, पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतें और रुपये की गिरावट जैसी समस्याएँ केंद्र सरकार की गलत आर्थिक नीतियों की वजह से हैं और जनता को इससे सीधा असर हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र खुद की उपलब्धियों का विज्ञापन करता है लेकिन आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ता जा रहा है।

तेजस्वी यादव का हमला

तेजस्वी यादव ने कहा कि महंगाई पर नियंत्रण लगाने की कोई ठोस ‘रेमेडी’ केंद्र सरकार के पास नहीं है उनके शब्दों में सिस्टम के पास महंगाई को रोकने की किसी भी असरदार दवा नहीं है, बस महंगाई की मेलोडी बज रही है।तेजस्वी ने रुपये की लगातार कमजोरी को भी निशाना बनाया और कहा कि भारतीय मुद्रा अब एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक बन गई है। उन्होंने उद्धृत किया कि संसद में पीएम बनने से पहले ही नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सरकार और रुपये में कौन नीचे गिरता है आज वही स्थिति सच्चाई बन चुकी है।

तेजस्वी ने पेट्रोल-डीज़ल, एलपीजी सिलेंडर, खाद, खाद्य तेल और दवाइयों की बढ़ती कीमतों का ज़िक्र करते हुए कहा कि आम परिवार का बजट ढांचे का इंतज़ार कर रहा है।उन्होंने आरोप लगाया कि डबल-इंजन सरकार ने महंगाई, बेरोज़गारी और गरीबी को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया है।

तेज़स्वी का राजनीतिक तंज और सोशल मीडिया पोस्ट

तेज़स्वी ने X (पहले ट्विटर) पर अपनी बात रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा, कहा कि भारत को वन ऑफ द वर्ल्ड्स लीडिंग इकॉनोमीज़ बताना जनता के साथ गुमराह करना है, क्योंकि प्रति व्यक्ति आमदनी और मुद्रा के संदर्भ में तस्वीर बिल्कुल अलग है। तेज़स्वी के आरोपों के साथ ही बिहार में विपक्षी दल की राजनीति भी तेज़ हो चुकी है— जहां विपक्ष महंगाई की समस्या पर केंद्र को घेर रहा है, वहीं सत्तारूढ़ भागीदारों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक दबाव और युद्ध के कारण ऊर्जा व वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हर देश में देखी जा रही है।

महंगाई का मुद्दा कितना गंभीर?

मुद्रा गिरावट — लगातार रुपये की गिरावट का प्रभाव आयात लागत, ऊर्जा कीमतों और रोज़मर्रा के खर्चों पर पड़ता है।

लॉगजिकल असर — बढ़ती कीमतें आम परिवार की जेब पर सीधा असर डालती हैं, खासकर खाद्य, ईंधन और दैनिक आवश्यक वस्तुओं के दामों पर। राजनीतिक मोर्चा —राजनीतिक दल इसे बड़ा मुद्दा बना रहे हैं क्योंकि यह जनता की जेब से जुड़ा वास्तविक दर्द है।