मध्य प्रदेश के छतरपुर स्थित बागेश्वर धाम एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक फैसला है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के नेतृत्व वाले संगठन को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए के तहत पंजीकरण दे दिया है।

इस मंजूरी के साथ अब बागेश्वर धाम विदेशों से चंदा प्राप्त कर सकेगा—एक ऐसा कदम जो धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।


क्या है FCRA और क्यों जक्यारूरी है यह मंजूरी?

भारत में कोई भी गैर-सरकारी संगठन (NGO) अगर विदेश से फंड लेना चाहता है, तो उसे FCRA के तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। यह कानून सुनिश्चित करता है कि विदेशी धन का उपयोग तय नियमों के तहत और पारदर्शिता के साथ हो।

बागेश्वर धाम से जुड़ी संस्था “श्री बागेश्वर जन सेवा समिति” को सांस्कृतिक, सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और ‘धार्मिक (हिंदू)’ श्रेणी में यह अनुमति दी गई है। यह पंजीकरण पांच साल के लिए वैध रहता है, जिसके बाद नवीनीकरण जरूरी होता है।


आंकड़ों में समझिए पूरा मामला

  • 15 अप्रैल तक इस साल 38 संस्थाओं को FCRA पंजीकरण मिला
  • इनमें से 6 संस्थाएं ‘धार्मिक (हिंदू)’ श्रेणी में शामिल हैं
  • देश में फिलहाल 14,500 से ज्यादा FCRA-पंजीकृत संस्थाएं सक्रिय हैं
  • 2015 से अब तक 18,000 से अधिक संस्थाओं के पंजीकरण रद्द किए जा चुके हैं

इन आंकड़ों से साफ है कि विदेशी फंडिंग को लेकर सरकार का रुख सख्त और नियंत्रित है।


कौन हैं धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री?

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री हाल के वर्षों में एक चर्चित धार्मिक कथावाचक के रूप में उभरे हैं। ‘हिंदू राष्ट्र’ जैसे मुद्दों पर उनके बयान अक्सर सुर्खियों में रहते हैं और वे कई बार राजनीतिक हस्तियों के साथ भी नजर आते हैं।


सियासी और सामाजिक बहस भी तेज

FCRA पंजीकरण को लेकर देश में पहले से ही बहस चलती रही है। हाल ही में केंद्र सरकार ने इस कानून में संशोधन का प्रस्ताव भी रखा था, जिसमें NGO की संपत्तियों पर नियंत्रण जैसे प्रावधान शामिल थे।

हालांकि, विपक्ष और कुछ राज्यों ने इसका विरोध किया, जिसके बाद इस पर आगे की कार्रवाई फिलहाल टाल दी गई है।


क्यों अहम है यह फैसला?

बागेश्वर धाम को मिली यह मंजूरी सिर्फ एक संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक नीति का हिस्सा है, जिसके तहत सरकार विदेशी फंडिंग को नियंत्रित और विनियमित करना चाहती है।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि इस फैसले के बाद धार्मिक संस्थाओं की भूमिका और उनकी फंडिंग को लेकर बहस किस दिशा में आगे बढ़ती है।