देश के कई राज्यों में बकरीद से पहले जहां नमाज, कुर्बानी और प्रशासनिक पाबंदियों को लेकर बहस तेज थी, वहीं बिहार में इस बार त्योहार अपेक्षाकृत शांत माहौल में गुजर गया। न बड़े विवाद सामने आए, न किसी बड़े तनाव की खबर आई। लेकिन इस शांति के बीच कुछ ऐसी तस्वीरें जरूर सामने आईं जिन्होंने राजनीतिक और सामाजिक चर्चा को नया मोड़ दे दिया। कहीं ईदगाह में जगह कम पड़ने पर लोगों ने सड़क पर नमाज पढ़ी, तो कहीं नमाजी हाथों में पोस्टर लेकर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग करते दिखे। बिहार में इस बार की बकरीद सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि उसने राज्य की बदलती राजनीति, प्रशासनिक रणनीति और सामाजिक संदेशों की भी झलक दिखाई। खासकर ऐसे समय में जब देश के कई हिस्सों में त्योहारों को लेकर सख्ती, बयानबाजी और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का माहौल बना हुआ था।
ईदगाह छोटी पड़ी, सड़क बनी नमाजगाह
जहानाबाद की तस्वीर सबसे ज्यादा चर्चा में रही। यहां ईदगाह में भीड़ ज्यादा हो गई और जगह कम पड़ गई। इसके बाद प्रशासन ने पहले से तैयार योजना के तहत सड़क के एक हिस्से को बैरिकेडिंग कर नमाज के लिए खाली कराया। गया-पटना मुख्य मार्ग पर कुछ समय के लिए ट्रैफिक डायवर्ट किया गया ताकि लोग आराम से नमाज अदा कर सकें। स्थानीय लोगों के मुताबिक जहानाबाद की ईदगाह लंबे समय से छोटी पड़ती रही है, लेकिन इस बार नमाजियों की संख्या और ज्यादा थी। प्रशासन ने हालात को देखते हुए पहले ही अतिरिक्त पुलिस बल और ट्रैफिक व्यवस्था लगा दी थी। नमाज के दौरान पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। पटना में भी स्टेशन के पास स्थित जामा मस्जिद के बाहर बड़ी संख्या में लोग नमाज पढ़ते नजर आए। हालांकि प्रशासन ने इसे शांतिपूर्ण तरीके से संभाला और कहीं से किसी टकराव या तनाव की खबर सामने नहीं आई।
ड्रोन से निगरानी, हर जिले में अलर्ट पर प्रशासन
बकरीद को लेकर बिहार सरकार इस बार पहले से ज्यादा सतर्क दिखाई दी। राज्य के कई संवेदनशील इलाकों में ड्रोन कैमरों से निगरानी की गई। जिलों में फ्लैग मार्च निकाले गए और पुलिस को विशेष अलर्ट पर रखा गया। मुख्य सचिव स्तर पर कानून व्यवस्था को लेकर बैठक भी हुई थी, जिसमें जिलों को शांति बनाए रखने के निर्देश दिए गए। हालांकि दिलचस्प बात यह रही कि सरकार की तरफ से नमाज या कुर्बानी को लेकर वैसी विस्तृत सार्वजनिक गाइडलाइन जारी नहीं की गईं जैसी कुछ दूसरे राज्यों में देखने को मिली थीं।राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बिहार सरकार ने इस बार ज्यादा सख्ती दिखाने की बजाय शांत प्रशासनिक प्रबंधन पर जोर दिया। इसका असर यह रहा कि त्योहार बिना बड़े विवाद के संपन्न हो गया।
गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की मांग ने खींचा ध्यान
बकरीद के दौरान सबसे ज्यादा चौंकाने वाली तस्वीरें दरभंगा और मुजफ्फरपुर से आईं। यहां कुछ लोग नमाज के दौरान पोस्टर लेकर पहुंचे, जिन पर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग लिखी हुई थी। मुजफ्फरपुर में RJD के विधान पार्षद कारी शोएब ने कहा कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो आंदोलन किया जाएगा। यह बयान इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि आमतौर पर गाय और गौ-राजनीति का मुद्दा बीजेपी और हिंदुत्व राजनीति से जुड़ा माना जाता है, लेकिन इस बार यह मांग मुस्लिम समाज के कुछ लोगों की तरफ से उठती दिखाई दी।राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह एक प्रतीकात्मक संदेश भी था, जिसके जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई कि धार्मिक सौहार्द और सामाजिक संवाद की राजनीति को नए तरीके से पेश किया जा सकता है।
सम्राट चौधरी की सरकार किस रास्ते पर?
बिहार की राजनीति में इस बार एक और बात चर्चा में रही- मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का रवैया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सम्राट चौधरी फिलहाल बेहद संतुलित रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सम्राट चौधरी कानून व्यवस्था के मामलों में सख्त छवि दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन धार्मिक त्योहारों पर टकराव से बचने को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही वजह रही कि प्रशासनिक तैयारी मजबूत रखी गई, लेकिन सार्वजनिक बयानबाजी और आक्रामक कार्रवाई से दूरी बनाई गई। कुछ विश्लेषक इसे “सुशासन और भाजपा मॉडल” के बीच संतुलन बनाने की कोशिश भी मानते हैं। क्योंकि बिहार की सामाजिक बनावट उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से अलग मानी जाती है, जहां धार्मिक और जातीय समीकरण राजनीति को सीधे प्रभावित करते हैं।
बिहार की तस्वीर बाकी राज्यों से अलग क्यों दिखी?
इस बार बकरीद के दौरान देश के कई राज्यों में खुले में नमाज, कुर्बानी और धार्मिक आयोजनों को लेकर विवाद देखने को मिले। कई जगह नेताओं के बयान चर्चा में रहे। लेकिन बिहार में तस्वीर अपेक्षाकृत शांत रही। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इसकी एक बड़ी वजह राज्य का सामाजिक और राजनीतिक संतुलन है। बिहार में लंबे समय से प्रशासनिक स्तर पर त्योहारों को लेकर स्थानीय संवाद और सामुदायिक तालमेल की रणनीति अपनाई जाती रही है। इस बार भी प्रशासन ने कानून व्यवस्था को प्राथमिकता दी, लेकिन धार्मिक गतिविधियों को लेकर अनावश्यक टकराव से बचने की कोशिश की। हालांकि सड़क पर नमाज और गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की मांग जैसी घटनाओं ने यह जरूर दिखाया कि त्योहार अब सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रह गए हैं। वे राजनीति, पहचान और सामाजिक संदेशों का हिस्सा भी बन चुके हैं।
