देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने साफ कहा कि लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा होता है और ऐसी परीक्षाओं में हुई गड़बड़ी सिर्फ तकनीकी गलती नहीं मानी जा सकती। कोर्ट की टिप्पणी ने यह साफ संकेत दिया कि अब मामला केवल एक परीक्षा की खामी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो चुके हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, “हम अपने देश के युवाओं को इस तरह निराश नहीं कर सकते।” अदालत ने माना कि NEET जैसी परीक्षा के पीछे छात्रों की सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, मानसिक दबाव, पारिवारिक उम्मीदें और पूरा करियर जुड़ा होता है। ऐसे में अगर परीक्षा प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें, तो उसका असर सीधे लाखों छात्रों के भरोसे पर पड़ता है।


जब निगरानी इतनी कड़ी थी, फिर गड़बड़ी कैसे हुई?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने NTA और केंद्र सरकार से सीधे सवाल पूछे। अदालत ने कहा कि जब परीक्षा के लिए हाई-लेवल निगरानी, एक्सपर्ट कमेटी और सख्त व्यवस्था लागू होने का दावा किया गया था, तो फिर इतनी बड़ी गड़बड़ी आखिर हुई कैसे? सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कोर्ट के निर्देश के मुताबिक हलफनामा दाखिल कर दिया गया है और एक्सपर्ट कमेटी की कई सिफारिशों को लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। लेकिन अदालत यहां संतुष्ट नजर नहीं आई। कोर्ट ने खास तौर पर डॉ. के. राधाकृष्णन से सवाल किए, जिनकी अध्यक्षता में NEET सुधारों को लेकर हाई-पावर एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई थी। अदालत ने पूछा कि जब आप शुरू से इस प्रक्रिया का हिस्सा थे, तो इन सुधारों के लागू होने की निगरानी कितनी गंभीरता से की गई? अगर निगरानी के बावजूद गड़बड़ी हुई है, तो इसका मतलब या तो सिफारिशों में कमी थी या उन्हें सही तरीके से लागू नहीं किया गया।


पेपर लीक ने सिर्फ परीक्षा नहीं, भरोसा भी तोड़ा

NEET पेपर लीक विवाद ने पिछले कुछ वर्षों में देशभर के छात्रों और अभिभावकों के बीच बड़ा अविश्वास पैदा किया है। मेडिकल कॉलेज में दाखिले का सपना देखने वाले लाखों छात्र सालों तक तैयारी करते हैं। कई छात्र छोटे शहरों और गांवों से आते हैं, जिनके परिवार अपनी जमा-पूंजी कोचिंग और पढ़ाई में लगा देते हैं। ऐसे में जब पेपर लीक या परीक्षा में धांधली की खबरें सामने आती हैं, तो सबसे ज्यादा चोट उन्हीं छात्रों को लगती है जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत की होती है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मानसिक तनाव का भी जिक्र किया।अदालत ने कहा कि इस तरह की परीक्षाएं सिर्फ नंबरों का खेल नहीं होतीं। इनके पीछे छात्रों की भावनाएं, समय और भविष्य जुड़ा होता है। इसलिए जिम्मेदारी तय होना बेहद जरूरी है।


अब NTA से मांगा गया पूरा रोडमैप

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और NTA से कहा है कि वे यह स्पष्ट करें कि आगे ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस व्यवस्था बनाई जा रही है। अदालत ने कहा कि सिर्फ बयान देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि परीक्षा प्रणाली को तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तर पर मजबूत बनाना होगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि संबंधित मंत्रालय एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करे, जिसमें बताया जाए कि भविष्य में परीक्षाएं किस प्रक्रिया के तहत आयोजित होंगी, निगरानी कैसे होगी और संस्थागत सुधार किस तरह लागू किए जाएंगे।अदालत ने यह भी कहा कि NTA को ऐसी संस्था बनाया जाना चाहिए जो तकनीकी और बौद्धिक दोनों स्तरों पर इतनी मजबूत हो कि 2024 और 2026 जैसी गड़बड़ियां दोबारा न हों।


NEET विवाद और NTA पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल

यह पहली बार नहीं है जब NTA की परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठे हों। पिछले कुछ वर्षों में NEET, CUET और दूसरी राष्ट्रीय परीक्षाओं को लेकर भी तकनीकी गड़बड़ी, पेपर लीक और परीक्षा प्रबंधन पर सवाल सामने आते रहे हैं! NEET विशेष रूप से संवेदनशील परीक्षा मानी जाती है क्योंकि इसके जरिए देशभर के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला होता है। हर साल लाखों छात्र इस परीक्षा में शामिल होते हैं और सीटों की संख्या सीमित होने के कारण प्रतिस्पर्धा बेहद कठिन होती है। इसी वजह से जब पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो उसका असर केवल परीक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो जाते हैं।


अब सिर्फ जांच नहीं, जवाबदेही की मांग

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि अदालत अब केवल जांच रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं होना चाहती। कोर्ट यह जानना चाहती है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या स्थायी बदलाव किए जाएंगे। देशभर के लाखों छात्र और उनके परिवार अब सिर्फ जांच पूरी होने का इंतजार नहीं कर रहे, बल्कि यह भी देख रहे हैं कि क्या इस बार परीक्षा प्रणाली में सचमुच कोई बड़ा सुधार होगा या फिर हर साल की तरह विवाद उठेंगे और धीरे-धीरे दब जाएंगे।