दुनिया इस समय ऊर्जा संकट, युद्ध और भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव और कच्चे तेल के बाजार में अनिश्चितता ने कई देशों में ईंधन की कीमतों को सीधे प्रभावित किया है। भारत सहित दुनिया के कई बड़े देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आम लोगों के बजट पर असर डाल रही हैं। लेकिन इसी दुनिया के नक्शे पर कुछ ऐसे देश भी हैं, जहां पेट्रोल आज भी इतनी कम कीमत पर मिलता है कि बाकी देशों के लिए यह लगभग अविश्वसनीय लगता है। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा दो देशों—वेनेजुएला और ईरान- की होती है, जहां सरकारें भारी सब्सिडी और विशेष योजनाओं के जरिए अपने नागरिकों को बेहद सस्ता ईंधन उपलब्ध कराती हैं।
तेल की धरती पर सस्ता ईंधन: वेनेजुएला का अनोखा मॉडल
वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार वाले देशों में गिना जाता है। दशकों से वहां ईंधन पर सरकारी सब्सिडी एक राजनीतिक और सामाजिक नीति का हिस्सा रही है। हालांकि आर्थिक संकट और महंगाई के बाद सरकार ने व्यवस्था में बदलाव किया, लेकिन आम नागरिकों के लिए राहत अभी भी जारी है। वहां एक विशेष पहचान प्रणाली लागू है, जिसे “फादरलैंड कार्ड” कहा जाता है। इस कार्ड के जरिए नागरिकों को हर महीने सीमित मात्रा में सब्सिडी वाला पेट्रोल दिया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, यदि कोई नागरिक महीने में 120 लीटर तक पेट्रोल लेता है, तो उसे बेहद कम कीमत पर ईंधन मिलता है। लेकिन इस सीमा से अधिक इस्तेमाल पर बाजार आधारित कीमतें लागू हो जाती हैं। यानी सस्ता तेल सभी के लिए नहीं, बल्कि तय नियमों और कोटे के भीतर उपलब्ध होता है।
ईरान में सब्सिडी का गणित: नागरिकों को तय मात्रा में राहत
ईरान भी दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल है और यहां सरकार लंबे समय से ईंधन सब्सिडी को सामाजिक नीति के तौर पर इस्तेमाल करती रही है। लेकिन बढ़ती खपत और सरकारी खर्च को देखते हुए वहां भी कोटा आधारित प्रणाली लागू की गई है। नई व्यवस्था के तहत नागरिकों को हर महीने शुरुआती 60 लीटर पेट्रोल बेहद कम दरों पर मिलता है। इसके बाद दूसरे स्तर में कीमत बढ़ जाती है, लेकिन वह भी अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में काफी कम रहती है। इस मॉडल का मकसद एक तरफ आम नागरिकों को राहत देना और दूसरी तरफ जरूरत से ज्यादा खपत को नियंत्रित करना माना जाता है।
सस्ता पेट्रोल, लेकिन इसकी भी एक कीमत है
पहली नजर में यह मॉडल आम लोगों के लिए बेहद आकर्षक लग सकता है, लेकिन इसके आर्थिक पहलू भी हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारी सब्सिडी सरकारों पर वित्तीय दबाव बढ़ाती है। कई बार इससे तस्करी, ईंधन की कृत्रिम मांग और सरकारी खर्च में असंतुलन जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं। वेनेजुएला और ईरान दोनों ही देश तेल उत्पादन में समृद्ध हैं, लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों और घरेलू चुनौतियों का सामना भी करते रहे हैं। ऐसे में सस्ता ईंधन केवल राहत की कहानी नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक रणनीति का भी हिस्सा है।
दुनिया के सामने बड़ा सवाल: क्या सस्ता ईंधन हमेशा टिकाऊ होता है?
आज जब कई देश हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तब सस्ते पेट्रोल का मॉडल एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है। क्या भारी सब्सिडी लंबे समय तक टिक सकती है? और क्या भविष्य में ऊर्जा की राजनीति बदलने के साथ यह मॉडल भी बदल जाएगा? फिलहाल इतना तय है कि जहां दुनिया के कई हिस्सों में लोग ईंधन की बढ़ती कीमतों से परेशान हैं, वहीं कुछ देशों में पेट्रोल आज भी राहत, राजनीति और सरकारी नीति-तीनों का मिश्रण बना हुआ है।
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