12 मई, 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के बारे में वरिष्ठ सैन्य अधिकारी प्रेस से बातचीत करते हुए। (फ़ाइल फ़ोटो: ITG)12 मई, 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के बारे में वरिष्ठ सैन्य अधिकारी प्रेस से बातचीत करते हुए। (फ़ाइल फ़ोटो: ITG)


ऑपरेशन सिंदूर: भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर को लेकर एक बार फिर देश की राजनीति गरमा गई है। इस बार विवाद की वजह सरकार द्वारा पहली बार उन छह सैन्यकर्मियों के नाम सार्वजनिक करना है, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सर्वोच्च बलिदान दिया था। इन नामों के सामने आने के बाद विपक्ष और कई राजनीतिक दलों ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के उस बयान पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं, जिसमें उन्होंने संसद में कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर में हमारे किसी भी सैनिक को नुकसान नहीं हुआ।

सरकार की ओर से अब इन छह शहीद सैनिकों के नाम राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (National War Memorial) के रोल ऑफ ऑनर में शामिल किए गए हैं। इसके बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह सवाल उठ रहा है कि यदि ऑपरेशन के दौरान सैनिक शहीद हुए थे, तो संसद में दिया गया बयान किस संदर्भ में था। विपक्ष इस मामले में सरकार से जवाब मांग रहा है, जबकि सोशल मीडिया पर रक्षा मंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन (Privilege Motion) की मांग भी उठाई जा रही है। हालांकि अब तक ऐसा कोई प्रस्ताव आधिकारिक तौर पर संसद में स्वीकार या सूचीबद्ध नहीं हुआ है।

संसद में क्या बोले थे राजनाथ सिंह और अब क्यों उठ रहे हैं सवाल?

ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में हुई चर्चा के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा था कि यह सैन्य अभियान पूरी तरह सफल रहा। बहस के दौरान उन्होंने विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि यदि पूछा जाए कि क्या इस ऑपरेशन में भारत के किसी भी सैनिक को नुकसान पहुंचा, तो उनका जवाब नहीं होगा। उस समय सरकार की ओर से भी ऑपरेशन के दौरान किसी सैनिक के शहीद होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई थी।

अब लगभग एक वर्ष बाद सरकार ने पहली बार आधिकारिक रूप से उन छह सैन्यकर्मियों के नाम सार्वजनिक किए हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। इन सभी के नाम नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के रोल ऑफ ऑनर में जोड़े गए हैं। इसके बाद विपक्ष का कहना है कि संसद में दिए गए बयान और अब सामने आई आधिकारिक जानकारी के बीच स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है।

सरकार द्वारा जारी सूची के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद होने वाले सैनिकों में सूबेदार मेजर पवन कुमार, राइफलमैन सुनील कुमार (वीर चक्र), लांस नायक दिनेश कुमार, एविएशन टेक्नीशियन मूड मुरली नाइक, हवलदार सुनील कुमार सिंह और भारतीय वायुसेना के सार्जेंट सुरेंद्र कुमार (वायु पदक) शामिल हैं। इनमें दो जवानों को मरणोपरांत वीरता पुरस्कार भी प्रदान किए गए हैं।

क्या था ऑपरेशन सिंदूर और कैसे शुरू हुआ पूरा सैन्य अभियान?

ऑपरेशन सिंदूर भारत द्वारा मई 2025 में चलाया गया एक बड़ा सैन्य अभियान था। यह कार्रवाई जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू की गई थी, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाते हुए सटीक सैन्य कार्रवाई की।

इस अभियान में भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना ने संयुक्त रूप से हिस्सा लिया। भारत की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की ओर से भी जवाबी सैन्य गतिविधियां शुरू हुईं। सीमा पर भारी गोलाबारी, ड्रोन हमले, मिसाइलों की तैनाती और सैन्य तनाव लगातार कई दिनों तक बना रहा। दोनों देशों के बीच लगभग चार दिनों तक हालात बेहद तनावपूर्ण रहे। बाद में दोनों पक्षों के बीच सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनी, जिसके बाद स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हुई।

ऑपरेशन सिंदूर को भारत की बड़ी सैन्य कार्रवाई माना गया था। सरकार ने इसे आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जवाब बताया था और दावा किया था कि इस अभियान में आतंकी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया गया।

6 शहीदों के नाम सामने आने के बाद क्यों तेज हो गया विवाद?

सरकार द्वारा शहीद सैनिकों के नाम सार्वजनिक किए जाने के बाद विपक्षी दलों ने रक्षा मंत्री के संसद में दिए गए बयान को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। कई नेताओं का कहना है कि यदि ऑपरेशन के दौरान सैनिक शहीद हुए थे, तो संसद को इसकी पूरी और सही जानकारी दी जानी चाहिए थी। सोशल मीडिया पर भी लगातार यह दावा किया जा रहा है कि संसद में गलत जानकारी दी गई और इसी आधार पर कुछ लोगों ने राजनाथ सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार हनन (Privilege Motion) की मांग उठाई है।

हालांकि अब तक संसद में रक्षा मंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का कोई आधिकारिक प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया है। फिलहाल यह केवल विपक्ष की राजनीतिक मांग और सोशल मीडिया पर चल रही बहस का हिस्सा है।

इस पूरे विवाद के बीच रक्षा मामलों के कुछ जानकारों का मानना है कि संसद में दिया गया बयान संभवतः ऑपरेशन के मुख्य हमलावर चरण में शामिल सैनिकों के संदर्भ में था, जबकि बाद में सार्वजनिक किए गए छह नाम पूरे सैन्य अभियान और उससे जुड़ी परिस्थितियों में शहीद हुए जवानों के हैं। हालांकि सरकार की ओर से इस संभावित अंतर को लेकर अब तक कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में सम्मान, लेकिन राजनीतिक बहस जारी

सरकार ने पहली बार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद हुए छह सैन्यकर्मियों की पहचान सार्वजनिक करते हुए उनके नाम राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के रोल ऑफ ऑनर में शामिल किए हैं। यह उन सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान को औपचारिक सम्मान देने की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके साथ ही दो शहीदों को मरणोपरांत वीरता सम्मान भी दिया गया है।

दूसरी ओर विपक्ष लगातार सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग कर रहा है कि संसद में दिया गया बयान और अब सार्वजनिक की गई जानकारी एक-दूसरे से अलग क्यों दिखाई देती है। कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि किसी भी चरण में सैनिकों की शहादत हुई थी, तो संसद को उसकी पूरी जानकारी मिलनी चाहिए थी। वहीं सरकार की ओर से अब तक केवल शहीदों के सम्मान और उनके नाम सार्वजनिक किए जाने की जानकारी दी गई है, लेकिन संसद में दिए गए बयान पर अलग से कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।

ऐसे में ऑपरेशन सिंदूर अब केवल एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि राजनीतिक और संसदीय बहस का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले दिनों में यदि विपक्ष इस मामले को औपचारिक रूप से संसद में उठाता है, तो इस पर विस्तृत चर्चा और सरकार से जवाब की मांग और तेज हो सकती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि छह शहीदों के नाम पहली बार आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किए जा चुके हैं, जबकि रक्षा मंत्री का संसद में दिया गया बयान भी रिकॉर्ड का हिस्सा है। इन्हीं दो तथ्यों के बीच उठे सवालों ने इस पूरे मामले को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।