दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिक इस साल बनने वाले ‘सुपर एल नीनो’ को बेहद खतरनाक मान रहे हैं। आशंका जताई जा रही है कि इसका असर पिछले 150 साल के मौसम रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ सकता है। भारत में इसका सबसे बड़ा प्रभाव मानसून पर पड़ने की संभावना है और यदि बिहार में बारिश सामान्य से कम हुई, तो राज्य को भीषण गर्मी, सूखा, पानी की कमी और खेती-किसानी के गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि एल नीनो के कारण समुद्र का तापमान बढ़ता है, जिससे मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इसका सीधा असर बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्यों पर पड़ता है, जहां लाखों किसानों की आजीविका बारिश पर निर्भर है।

मानसून कमजोर पड़ा तो सूखे जैसे हालात बन सकते हैं

बिहार की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खेती पर टिका हुआ है और खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर करती है। यदि इस बार मानसून कमजोर रहा और बारिश सामान्य से कम हुई, तो राज्य के कई जिलों में सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। धान की खेती सबसे ज्यादा प्रभावित होगी, क्योंकि इसकी बुआई और उत्पादन पर्याप्त बारिश पर आधारित होता है। खेतों में नमी कम होने से फसल की पैदावार घट सकती है और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। ग्रामीण इलाकों में तालाब, पोखर और नहरों का जलस्तर भी तेजी से घट सकता है, जिससे पीने के पानी और सिंचाई दोनों की समस्या गहरा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो हालात बेहद चिंताजनक हो सकते हैं।

भीषण गर्मी और लू से बढ़ सकती है परेशानी

सुपर एल नीनो का असर केवल बारिश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह तापमान को भी खतरनाक स्तर तक पहुंचा सकता है। बिहार में पहले से ही हर साल गर्मी नए रिकॉर्ड बना रही है और इस बार स्थिति और गंभीर होने की आशंका जताई जा रही है। मौसम विभाग के अनुसार कई जिलों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार जा सकता है। लंबे समय तक चलने वाली लू लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती है। खासकर बच्चे, बुजुर्ग और मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मरीज बढ़ सकते हैं। ग्रामीण इलाकों में जहां बिजली की व्यवस्था कमजोर है, वहां लोगों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। गर्म हवाओं और उमस भरे मौसम के कारण सामान्य जनजीवन भी बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है।

किसानों पर बढ़ेगा आर्थिक दबाव

कम बारिश और बढ़ती गर्मी का सबसे ज्यादा असर किसानों की जेब पर पड़ेगा। बारिश नहीं होने की स्थिति में किसानों को डीजल पंप और ट्यूबवेल के जरिए सिंचाई करनी पड़ेगी, जिससे खेती की लागत कई गुना बढ़ जाएगी। पहले से महंगे बीज, खाद और डीजल की कीमतों के बीच अतिरिक्त सिंचाई किसानों के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन सकती है। यदि फसल खराब हुई, तो किसानों को कर्ज और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बदलते मौसम चक्र के कारण खेती का पारंपरिक तरीका अब जोखिम भरा होता जा रहा है। ऐसे में सरकार को किसानों के लिए राहत पैकेज, बीमा और वैकल्पिक फसलों की योजना पर गंभीरता से काम करने की जरूरत होगी।

पानी और बिजली संकट की आशंका

भीषण गर्मी और कम बारिश का असर बिजली और पानी की सप्लाई पर भी साफ दिखाई दे सकता है। तापमान बढ़ने के साथ ही एसी, कूलर और पंखों का इस्तेमाल बढ़ेगा, जिससे बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती है। कई शहरों और कस्बों में बिजली कटौती की समस्या बढ़ सकती है। दूसरी ओर जलस्तर गिरने से हैंडपंप और कुएं सूखने लगेंगे, जिससे ग्रामीण इलाकों में पानी का संकट गहरा सकता है। शहरी क्षेत्रों में भी पानी की सप्लाई प्रभावित होने की संभावना है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर समय रहते जल संरक्षण और बिजली प्रबंधन की तैयारी नहीं की गई, तो आने वाले महीनों में लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ सकती है।

सरकार के सामने बड़ी चुनौती

यदि बिहार में मानसून कमजोर रहा, तो राज्य सरकार और प्रशासन के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। सूखे की स्थिति बनने पर राहत कार्य, किसानों को मुआवजा, बिजली व्यवस्था और पेयजल उपलब्ध कराना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाएगा। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब मौसम पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित हो गया है। ऐसे में सरकार को पहले से तैयारी करनी होगी, ताकि किसी बड़े संकट की स्थिति में नुकसान को कम किया जा सके। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आने वाले समय में जल संरक्षण, आधुनिक सिंचाई तकनीक और मौसम आधारित खेती ही ऐसे संकटों से बचने का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकता है।