बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए नामांकन का आज आखिरी दिन है, लेकिन सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा किसी उम्मीदवार की नहीं, बल्कि बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश की हो रही है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर बड़ा सस्पेंस बना हुआ है। चर्चा है कि वह इस बार MLC चुनाव के लिए नामांकन दाखिल नहीं करेंगे। अगर ऐसा होता है, तो सिर्फ उनकी उम्मीदवारी ही नहीं, बल्कि मंत्री पद भी खतरे में पड़ सकता है। बता दें कि बिहार विधान परिषद की इन सीटों के लिए मतदान 26 जून को होना है, जबकि मतगणना 30 जून को होगी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर NDA की रणनीति क्या है और दीपक प्रकाश के राजनीतिक भविष्य का अगला अध्याय क्या होगा?
NDA में सीट को लेकर क्या हुआ?
सूत्रों के अनुसार, बीजेपी की ओर से उपेंद्र कुशवाहा को प्रस्ताव दिया गया था कि उनके बेटे दीपक प्रकाश को कमल चुनाव चिह्न पर विधान परिषद भेजा जा सकता है। हालांकि बताया जा रहा है कि कुशवाहा इस व्यवस्था के लिए तैयार नहीं हुए। इसके बाद NDA की ओर से जारी उम्मीदवारों की सूची में दीपक प्रकाश का नाम शामिल नहीं किया गया।
क्यों खतरे में है मंत्री पद?
दीपक प्रकाश फिलहाल बिहार विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार कोई व्यक्ति विधायक या विधान पार्षद बने बिना अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है। इसके बाद उसे किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है, अन्यथा मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।दीपक प्रकाश ने 21 नवंबर 2025 को मंत्री पद की शपथ ली थी और 22 नवंबर को उन्हें पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। ऐसे में उनका छह महीने का कार्यकाल मई 2026 में पूरा हो चुका है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर सरकार उन्हें मंत्री बनाए रखना चाहती तो उन्हें इस विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवार बनाया जाता।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका यानी PIL भी दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि संविधान के तहत छह महीने की अवधि पूरी होने के बाद किसी गैर-विधायक को दोबारा मंत्री पद पर बनाए रखना संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ हो सकता है। याचिका में इस नियुक्ति की वैधता और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल उठाए गए हैं।
अब सभी की नजर नामांकन प्रक्रिया और NDA के अंतिम फैसले पर है। यदि दीपक प्रकाश चुनावी मैदान से बाहर रहते हैं, तो उनके मंत्री पद को लेकर बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक सवाल खड़ा हो सकता है। आने वाले दिनों में यह मामला बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
