क्या कानून सभी के लिए एक जैसा है, या परिस्थितियों और मामलों के हिसाब से उसकी व्याख्या बदल जाती है? सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक तस्वीर ने यही सवाल फिर से राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। एक तरफ बिहार के मुजफ्फरपुर में मुहर्रम जुलूस के दौरान पुलिस वर्दी में तलवारबाजी करते दिखे दारोगा मुस्तकीम खान के खिलाफ कार्रवाई हुई, जबकि दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के संभल में गदा यात्रा के दौरान गदा लिए नजर आए सीओ अनुज चौधरी के मामले को लेकर कार्रवाई न होने का दावा किया जा रहा है। इसी तुलना ने सोशल मीडिया पर 'डुअल स्टैंडर्ड' यानी दोहरे मापदंड की बहस को हवा दे दी है।तलवार बनाम गदा: वायरल तुलना

तलवार बनाम गदा: वायरल तुलना

मुजफ्फरपुर की घटना: वायरल वीडियो के बाद हुई विभागीय कार्रवाई

बिहार के मुजफ्फरपुर में मुहर्रम के ताजिया जुलूस के दौरान कांटी थाना में तैनात दारोगा मुस्तकीम खान का दो तलवारों के साथ करतब दिखाते हुए वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस महकमे ने इसे गंभीरता से लिया। एसएसपी ने दारोगा को लाइन हाजिर कर दिया, कारण बताओ नोटिस जारी किया और विभागीय जांच के आदेश भी दिए। अधिकारियों का कहना था कि वर्दी में इस तरह सार्वजनिक प्रदर्शन पुलिस आचार संहिता के खिलाफ है और इससे पुलिस की निष्पक्ष छवि प्रभावित होती है।

संभल की तस्वीर भी चर्चा में, लेकिन कार्रवाई को लेकर दावे अलग-अलग

वायरल पोस्ट में उत्तर प्रदेश के संभल के सीओ अनुज चौधरी की तस्वीर भी साझा की जा रही है, जिसमें वह धार्मिक यात्रा के दौरान गदा लिए दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर दावा किया गया है कि उनके खिलाफ कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं हुआ, न ही उन्हें लाइन हाजिर किया गया। हालांकि, इस दावे की आधिकारिक पुष्टि संबंधित पुलिस विभाग की ओर से सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है। यह भी सामने आया कि उनका तबादला नियमित प्रशासनिक फेरबदल के तहत हुआ था, जिसे सोशल मीडिया पर इस मामले से जोड़कर पेश किया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर 'डबल स्टैंडर्ड' का सवाल लेकिन तथ्यों की जांच जरूरी

वायरल ग्राफिक में दोनों घटनाओं को साथ रखकर यह संदेश दिया जा रहा है कि अलग-अलग धार्मिक आयोजनों में शामिल दो पुलिस अधिकारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया गया। इसी आधार पर पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, दोनों मामलों की परिस्थितियां, स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट, विभागीय नियमों का उल्लंघन और उपलब्ध साक्ष्य अलग-अलग हो सकते हैं। ऐसे में केवल वायरल पोस्ट के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं माना जा सकता। किसी भी मामले में अंतिम स्थिति आधिकारिक जांच और विभागीय रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होती है।

कानून की निष्पक्षता पर भी सवाल उठता है

यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब सोशल मीडिया किसी भी घटना को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस बल की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सभी मामलों में एक समान मानदंड अपनाना और कार्रवाई की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक करना आवश्यक है। वहीं प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि हर मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों, साक्ष्यों और सेवा नियमों के आधार पर किया जाता है, न कि सोशल मीडिया पर चल रहे नैरेटिव के आधार पर। फिलहाल यह मामला कानून की समानता और पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता पर नई बहस को जन्म दे चुका है।