UP Election 2027: बीजेपी ने विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाकर बड़ी जिम्मेदारी दी है. बिहार में NDA की जीत के बाद अब उनके सामने यूपी में पार्टी के प्रदर्शन को मजबूत करने और सपा के PDA फॉर्मूले का मुकाबला करने की चुनौती है.
UP Election 2027:विनोद तावड़े को यूपी की कमान मिलते ही क्यों बढ़ी बीजेपी की चुनौती? सामने है अमित शाह वाला सबसे बड़ा टेस्टSource : Hindustan Times.com
भारतीय राजनीति में उत्तर प्रदेश की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है. 80 लोकसभा सीटों वाला यह राज्य बीजेपी और नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण आधार है. इसी वजह से बीजेपी ने पिछले सप्ताह राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया है. पार्टी ने करीब दो साल से खाली पड़े यूपी प्रभारी के पद को अब भरा है. बिहार चुनाव में NDA को बड़ी जीत दिलाने वाले संगठनात्मक रणनीतिकार तावड़े को यह जिम्मेदारी दी गई है. वहीं जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह-प्रभारी बनाया गया है.
यूपी में बिहार वाला प्रयोग दोहराने की चुनौती
विनोद तावड़े की नियुक्ति को समझने के लिए बीजेपी के 2013-14 के दौर को देखना जरूरी है. उस समय अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था. तब राज्य में बीजेपी के पास केवल 10 लोकसभा सीटें थीं और 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को करीब 12 प्रतिशत वोट मिले थे. शाह ने एक साल के दौरान करीब 93 हजार किलोमीटर की यात्रा की और 52 जिलों का दौरा किया. इसके बाद पार्टी ने ऐसा सामाजिक समीकरण तैयार किया, जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी गठबंधन को 80 में से 73 सीटों तक पहुंचा दिया.
इस सफलता के बाद अमित शाह की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका और मजबूत हुई. शाह ने हाल में एक इंटरव्यू में भी बताया था कि उस समय संगठन को मजबूत करना, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को वोट में बदलना और जातीय राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय मुद्दों पर मतदान का माहौल बनाना बड़ी चुनौती थी. अब बीजेपी के सामने तावड़े के जरिए इसी तरह की सफलता दोहराने की उम्मीद है. हालांकि इस बार चुनौती पहले से अधिक कठिन है, क्योंकि विपक्ष ने भी अपने जातीय समीकरण को काफी मजबूत किया है.
तावड़े के पास पहले से है यूपी का अनुभव
विनोद तावड़े इस जिम्मेदारी के लिए पूरी तरह नए नहीं हैं. उन्होंने महाराष्ट्र में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी और देवेंद्र फडणवीस सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं. इसके अलावा वह हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों के प्रभारी रह चुके हैं. खास तौर पर 2025 के बिहार चुनाव में NDA की बड़ी जीत में उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया.
अब उन्हें बीजेपी के सबसे बड़े और जटिल चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी मिली है. 62 वर्षीय तावड़े मराठा नेता हैं और बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में सुनील बंसल के साथ संगठन में महत्वपूर्ण महासचिव के रूप में बने हुए हैं. करीब डेढ़ साल से यूपी में सक्रिय रहने के कारण वह संगठनात्मक चुनाव, जिला स्तर की टीमों के गठन और कैबिनेट विस्तार जैसी प्रक्रियाओं से भी जुड़े रहे हैं. इससे उन्हें राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने का अनुभव मिला है.
यूपी में तावड़े की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि विनोद तावड़े और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने 2027 के विधानसभा चुनाव में असली चुनौती क्या होगी. मूल सवाल यह है कि क्या हिंदुत्व और विकास का बीजेपी मॉडल जातिगत गोलबंदी की राजनीति को मात दे पाएगा?
2024 के लोकसभा चुनाव ने बीजेपी के यूपी मॉडल को बड़ा झटका दिया था. समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाला NDA 36 सीटों तक सीमित रह गया. अकेले समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया.
अखिलेश यादव का PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूला गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच प्रभाव बनाने में सफल रहा. इससे बीजेपी के उस सामाजिक गठबंधन को चुनौती मिली, जिसे पार्टी ने 2014 के बाद काफी मेहनत से तैयार किया था.
हिंदुत्व, विकास और लाभार्थी योजनाओं पर बीजेपी का दांव
यूपी में बीजेपी की रणनीति केवल जातीय समीकरण तक सीमित नहीं है. पार्टी बूथ स्तर को मजबूत करने, सामाजिक संतुलन बनाने, योगी सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर और कल्याणकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने तथा लाभार्थियों से सीधा संपर्क बढ़ाने पर जोर दे रही है.
बीजेपी की कोशिश ऐसी राजनीतिक कहानी तैयार करने की है जिसमें विकास और हिंदुत्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि साथ चलने वाले मुद्दे दिखाई दें. राम मंदिर को भावनात्मक प्रतीक और एक्सप्रेसवे, इंफ्रास्ट्रक्चर तथा रोजगार को विकास के व्यावहारिक उदाहरण के तौर पर पेश किया जा सकता है.
यही वह रणनीति है जिसके जरिए पार्टी जातीय पहचान की राजनीति के मुकाबले व्यापक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
बीजेपी कैसे करेगी सपा के PDA का मुकाबला?
बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला है. समाजवादी पार्टी लगातार इस रणनीति को विस्तार देने की कोशिश कर रही है. हाल में अखिलेश यादव ने जनेश्वर मिश्र जयंती पर 'P' का अर्थ 'पंडित' भी बताया, जिससे संकेत मिलता है कि पार्टी सवर्ण मतदाताओं के बीच भी अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रही है.
दूसरी बड़ी चुनौती पार्टी संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल की है. राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार 2024 के चुनाव में संगठन और सरकार के बीच समन्वय की कमी तथा जमीनी कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी बीजेपी के लिए नुकसानदायक रही थी.
ऐसे में तावड़े की परीक्षा सिर्फ चुनावी रणनीति बनाने की नहीं होगी, बल्कि यह भी देखना होगा कि वह योगी सरकार और बीजेपी संगठन के बीच कितना प्रभावी समन्वय बना पाते हैं.
क्या तावड़े दोहरा पाएंगे अमित शाह वाला करिश्मा?
विनोद तावड़े की नियुक्ति को केवल संगठनात्मक बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. यह 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव तक बीजेपी की लंबी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है.
2014 में अमित शाह ने यूपी में जातीय समीकरणों को चुनौती देते हुए बीजेपी के लिए ऐतिहासिक परिणाम हासिल किया था. अब सवाल यह है कि क्या विनोद तावड़े अपने संगठनात्मक अनुभव और योगी आदित्यनाथ के विकास व हिंदुत्व के मॉडल के सहारे यूपी में वैसा ही राजनीतिक प्रदर्शन दोहरा पाएंगे, या अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला एक बार फिर राज्य की राजनीति की दिशा तय करेगा?
आने वाले महीनों में यूपी की राजनीति इसी मुकाबले के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ सकती है और 2027 का विधानसभा चुनाव बीजेपी तथा विपक्ष दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा.
