इंडोनेशिया: जहां आज की दुनिया ह्यूमन राइट्स और बराबरी की वकालत करती है, वहीं इंडोनेशिया के सुंबा द्वीप की एक रिपोर्ट ने दुनिया को चौंका दिया है। इसमें दावा किया गया है कि द्वीप के कुछ हिस्सों में सदियों पुराना गुलामी जैसा सिस्टम आज भी मौजूद है, जहां कुछ परिवार पीढ़ियों से गुलामी में रहने को मजबूर हैं। ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट का कहना है कि यहां पैदा होने वाले कई बच्चों को जन्म से ही अपने मालिकों का गुलाम माना जाता है और उन्हें आज़ाद ज़िंदगी जीने का हक नहीं दिया जाता।

रिपोर्ट के मुताबिक, सुंबा द्वीप पर सोशल सिस्टम पारंपरिक मारापू परंपरा और जाति के ढांचे से प्रभावित है। यह सिस्टम समाज को अलग-अलग क्लास में बांटता है। असरदार और अमीर क्लास को मारंबा कहा जाता है, आम नागरिकों को कबिहू कहा जाता है, और सबसे निचले क्लास को अता कहा जाता है। ह्यूमन राइट्स संगठनों का आरोप है कि अता समुदाय पीढ़ियों से बंधुआ मजदूरी और सामाजिक शोषण का सामना कर रहा है।

कहा जाता है कि इन लोगों को खेतों में काम करने, जानवरों की देखभाल करने और अपने मालिकों के घरों में घरेलू काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। आरोप है कि बदले में उन्हें सही मज़दूरी, शिक्षा और आज़ादी से जीने के अधिकार से वंचित रखा जाता है। कई परिवार पीढ़ियों तक इस सिस्टम में फंसे रहते हैं।

ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट ने भी महिलाओं और लड़कियों की बुरी हालत पर गहरी चिंता जताई है। कई रिपोर्ट्स में आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में, उन्हें यौन शोषण और हिंसा का सामना करना पड़ता है। हालांकि सभी मामलों में ऐसे आरोपों की स्वतंत्र और पूरी तरह से पुष्टि नहीं हो पाती है, लेकिन इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन ने निष्पक्ष जांच और पीड़ितों की सुरक्षा की मांग की है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईस्ट सुंबा इलाके में बड़ी संख्या में लोग अभी भी इस पारंपरिक सिस्टम से प्रभावित हैं। हालांकि इंडोनेशिया का संविधान और कानून गुलामी और बंधुआ मज़दूरी को मान्यता नहीं देता है, लेकिन दूर-दराज के इलाकों में सामाजिक परंपराओं और खराब एडमिनिस्ट्रेटिव पहुंच की वजह से ऐसे रिवाजों का लगातार विरोध हो रहा है।

ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन का कहना है कि सरकार को प्रभावित लोगों के पुनर्वास, शिक्षा, कानूनी मदद और सामाजिक जागरूकता पर ध्यान देना चाहिए, ताकि किसी को भी जन्म के आधार पर गुलामी या शोषण का सामना न करना पड़े। यह मामला एक बार फिर दुनिया को याद दिलाता है कि आज के समय में भी, ह्यूमन राइट्स की रक्षा करना और सामाजिक बराबरी पक्का करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।