
मद्रास हाईकोर्ट ने तलाक के बाद दूसरी शादी और हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 15 पर अहम टिप्पणी की।Source : Chrome
तलाक के बाद दोबारा शादी करने के अधिकार को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि विवाह करने का अधिकार मानवाधिकार से जुड़ा है और केवल तलाक के खिलाफ अपील लंबित होने के आधार पर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक दूसरी शादी से रोकना उचित नहीं है। कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 15 में बदलाव की जरूरत भी बताई, ताकि ऐसी स्थिति में लोगों को वर्षों तक अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
अपील लंबित थी, फिर भी पत्नी ने रचाई दूसरी शादी
मामला एक ऐसे दंपति से जुड़ा है, जिनकी शादी वर्ष 2001 में हुई थी और उनके दो बच्चे हैं। पत्नी ने पति पर क्रूरता और प्रताड़ना के आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए दोनों का विवाह समाप्त कर दिया।इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, अपील दाखिल होने के बावजूद तलाक के आदेश पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई गई थी। इसी दौरान पत्नी ने दूसरी शादी कर ली।
कोर्ट के सामने उठा दूसरी शादी का सवाल
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी की ओर से बताया गया कि वह पहले ही दोबारा शादी कर चुकी है। इसके बाद अदालत के सामने सवाल आया कि जब तलाक के खिलाफ अपील लंबित हो, तब दूसरे पक्ष की दूसरी शादी की कानूनी स्थिति क्या होगी।इसी संदर्भ में जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की पीठ ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 15 की व्याख्या की। यह धारा तलाक के बाद दोबारा विवाह करने से जुड़ी कानूनी परिस्थितियों को निर्धारित करती है।
धारा 15 में दूसरी शादी को लेकर क्या प्रावधान है?
मौजूदा व्यवस्था के तहत तलाक के बाद दूसरी शादी तब तक नहीं की जा सकती, जब तक अपील का अधिकार समाप्त न हो जाए या अपील की अवधि खत्म न हो जाए। इसी तरह, अगर अपील दाखिल नहीं की गई है या दायर की गई अपील खारिज हो चुकी है, तो दोबारा शादी का रास्ता साफ हो सकता है।हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने माना कि केवल अपील दाखिल कर देने से दूसरे पक्ष को वर्षों तक दोबारा शादी करने से रोकना उचित नहीं है।
दो महीने में स्टे लेने की जरूरत बताई
अदालत ने कहा कि अगर अपील करने वाला पक्ष तलाक के आदेश पर रोक चाहता है तो उसे अंतरिम स्टे हासिल करने के लिए समय रहते कदम उठाना चाहिए। पीठ ने सुझाव दिया कि अपील दाखिल होने के दो महीने के भीतर अगर तलाक के आदेश पर अंतरिम रोक नहीं मिलती है, तो सिर्फ अपील लंबित रहने के आधार पर दूसरी शादी को अनिश्चित समय तक नहीं रोका जाना चाहिए।कोर्ट ने इसी वजह से हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 15 में बदलाव की जरूरत बताई, ताकि तलाक के बाद दोबारा शादी के मामलों में लंबे समय तक कानूनी अनिश्चितता न बनी रहे।
‘विवाह करने का अधिकार मानवाधिकार’
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि शादी करने का अधिकार मानवाधिकार से जुड़ा है। हालांकि इस अधिकार के साथ कानूनी शर्तें भी लागू होती हैं, लेकिन जब कानून इस अधिकार पर रोक लगाता है तो उसकी व्याख्या सख्ती से की जानी चाहिए।पीठ ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को केवल इसलिए वर्षों तक दूसरी शादी के अधिकार से वंचित रखा जाता है क्योंकि तलाक के खिलाफ अपील लंबित है, तो ऐसी स्थिति उचित नहीं कही जा सकती।
अपील डिफॉल्ट में खारिज हुई तो क्या होगा?
अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि अगर तलाक के खिलाफ दायर अपील गैर-पैरवी या डिफॉल्ट के कारण खारिज हो जाती है, तो धारा 15 के तहत दूसरी शादी पर लगी रोक का प्रभाव खत्म हो सकता है।अगर बाद में अपील को बहाल करने की अर्जी दाखिल की जाती है और तब तक दूसरा पक्ष दोबारा शादी कर चुका होता है, तो ऐसी स्थिति में लंबित अपील को प्रभावहीन मानकर खारिज किया जा सकता है। कोर्ट के मुताबिक, तब यह देखना जरूरी नहीं होगा कि दूसरी शादी किस तारीख को हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लैला गुप्ता बनाम लक्ष्मी नारायण फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में कहा गया था कि हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 15 का उल्लंघन करके की गई शादी अपने आप समाप्त नहीं होती और न ही उसे स्वतः शून्य माना जा सकता है।हाईकोर्ट ने माना कि इस तरह की स्थिति में एक वैध विवाह का भविष्य लंबे समय तक लंबित अपील के अनिश्चित नतीजे पर निर्भर रह सकता है।
पत्नी के चरित्र पर शक करना भी मानसिक क्रूरता
इसी मामले में अदालत ने पति की ओर से पत्नी के चरित्र पर संदेह किए जाने को भी गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि पति या पत्नी के चरित्र पर शक करना मानसिक क्रूरता का आधार बन सकता है, चाहे आरोप सीधे लगाए गए हों या इशारों के जरिए।इसी आधार पर मद्रास हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट की टिप्पणी ने तलाक के बाद दूसरी शादी, अपील की लंबित स्थिति और धारा 15 की कानूनी व्याख्या को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को सामने ला दिया है।
