आज बाजार में कोल्ड ड्रिंक के कई बड़े ब्रांड मौजूद हैं, लेकिन 1980 और 1990 के दशक में पली-बढ़ी पीढ़ी के लिए गोल्ड स्पॉट का नाम किसी पुरानी याद से कम नहीं है। संतरे के स्वाद वाली इस रंगीन ड्रिंक ने भारतीय बाजार में अपनी अलग पहचान बनाई थी। बच्चों के जन्मदिन, गर्मियों की छुट्टियां और दोस्तों के साथ दुकान पर ठंडी बोतल पीने का आनंद उस दौर की जिंदगी का हिस्सा हुआ करता था। बॉलीवुड अभिनेत्री रेखा से जुड़े इसके विज्ञापनों ने भी ब्रांड को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। कभी बच्चों की पसंद मानी जाने वाली यह ड्रिंक बाद में युवाओं को आकर्षित करने वाले अंदाज में सामने आई, लेकिन कुछ ही वर्षों बाद इसका नाम बाजार से गायब हो गया।
1952 में हुई गोल्ड स्पॉट की शुरुआत
गोल्ड स्पॉट की कहानी भारतीय पेय बाजार में पारले की मौजूदगी और उसके कारोबारी प्रयोगों से जुड़ी है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, पारले ने पहले ‘ग्लूको कोला’ नाम से पेय बाजार में उतारा था, लेकिन कोका-कोला से जुड़े कानूनी विवाद के बाद 1951 में इसे बंद करना पड़ा। इसके अगले वर्ष, यानी 1952 में, कंपनी ने संतरे के स्वाद वाला गोल्ड स्पॉट पेश किया। यह उस समय का दौर था, जब भारत में पैकेटबंद और बोतलबंद पेय पदार्थों का बाजार आज जितना व्यापक नहीं था। गोल्ड स्पॉट ने अपने खास स्वाद और चमकीली पहचान के सहारे उपभोक्ताओं के बीच जगह बनाई। इसकी बोतलें दुकानों और व्यस्त चौराहों पर बिकती थीं। दुकानदार बर्फ से भरे बर्तनों में बोतलों को ठंडा रखते थे, ताकि ग्राहक गर्मी में ठंडी ड्रिंक का आनंद ले सकें। धीरे-धीरे गोल्ड स्पॉट भारतीय उपभोक्ताओं के लिए जाना-पहचाना नाम बन गया। संतरे का स्वाद इसे दूसरे पेय पदार्थों से अलग पहचान देता था।
बच्चों के बीच क्यों था इतना क्रेज?
गोल्ड स्पॉट की लोकप्रियता का एक बड़ा हिस्सा बच्चों से जुड़ा था। गर्मियों की छुट्टियों में दोस्तों के साथ दुकान पर जाकर ठंडी बोतल खरीदना कई बच्चों के लिए खास अनुभव होता था। जन्मदिन और दूसरे छोटे पारिवारिक आयोजनों में भी ऐसी ड्रिंक का इस्तेमाल किया जाता था। इस ब्रांड से जुड़ी एक दिलचस्प याद बोतलों के ढक्कनों की भी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ ढक्कनों के अंदर कार्टून बने होते थे। बच्चे इन चित्रों वाले ढक्कनों को इकट्ठा करने में दिलचस्पी लेते थे। कई बच्चे अपने जेब खर्च से ड्रिंक खरीदते और बाद में ढक्कन संभालकर रखते थे। इस तरह उत्पाद का अनुभव केवल पेय पीने तक सीमित नहीं रहता था, बल्कि उससे जुड़ी छोटी-छोटी चीजें भी बच्चों के आकर्षण का हिस्सा बन जाती थीं। उस समय विज्ञापन, बोतल की पहचान और स्वाद के साथ ऐसी यादें किसी ब्रांड को लोगों के बीच लंबे समय तक लोकप्रिय बनाए रखने में मदद करती थीं।
रेखा के विज्ञापनों ने बदली ब्रांड की छवि
गोल्ड स्पॉट की पहचान को मजबूत बनाने में बॉलीवुड अभिनेत्री रेखा से जुड़े विज्ञापनों का भी उल्लेख किया जाता है। उस दौर में रेखा भारतीय सिनेमा की चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल थीं। उनके आकर्षक अंदाज और कैमरे के सामने आत्मविश्वास से भरी मौजूदगी ने ब्रांड के विज्ञापनों को खास पहचान दी। रेखा को ड्रिंक पीते हुए अंदाज में पोज देते देखना उस समय के विज्ञापनों की यादों का हिस्सा बन गया। किसी लोकप्रिय फिल्मी सितारे का किसी उत्पाद से जुड़ना उस दौर में उपभोक्ताओं का ध्यान खींचने का प्रभावी तरीका था। गोल्ड स्पॉट के मामले में भी अभिनेत्री की लोकप्रियता ने ब्रांड की छवि को मजबूत करने में योगदान दिया। हालांकि, किसी ब्रांड की सफलता केवल एक सितारे पर निर्भर नहीं होती। स्वाद, उपलब्धता, विज्ञापन की शैली और ग्राहकों के साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव भी लंबे समय तक लोकप्रियता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
‘द जिंग थिंग’ ने युवाओं को बनाया निशाना
1980 के दशक के मध्य तक गोल्ड स्पॉट के सामने एक नई चुनौती थी। ब्रांड को केवल बच्चों की पसंद के रूप में सीमित नहीं रहना था, बल्कि युवाओं को भी आकर्षित करना था। इसके लिए विज्ञापन की भाषा और प्रस्तुति में बदलाव किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, विज्ञापन एजेंसी रेडिफ्यूजन और कमलेश पांडे ने इसके लिए ‘द जिंग थिंग’ टैगलाइन तैयार की। इसके बाद प्रह्लाद कक्कड़ और लुई बैंक की टीम से जुड़े विज्ञापनों ने ब्रांड को अधिक आधुनिक, ऊर्जावान और युवा अंदाज में पेश किया। पश्चिमी संगीत और ‘ग्रीस’ फिल्म जैसी शैली से प्रेरित प्रस्तुतियों ने इसके विज्ञापनों को उस समय के पारंपरिक प्रचार से अलग रूप दिया। इस रणनीति का उद्देश्य गोल्ड स्पॉट को बच्चों की मीठी संतरे वाली ड्रिंक की छवि से आगे ले जाकर युवाओं के लिए एक स्टाइलिश विकल्प के तौर पर स्थापित करना था। ‘द मोस्ट पॉपुलर अनकोला’ और ‘फॉर मी’ जैसी ब्रांडिंग से जुड़ी पहचान ने इसे अलग अंदाज में पेश करने की कोशिश की। इस बदलाव से गोल्ड स्पॉट की छवि में नया रंग आया। विज्ञापन अब सिर्फ स्वाद के बारे में नहीं थे, बल्कि उनमें युवा संस्कृति, संगीत और व्यक्तित्व को भी जगह दी गई।
1993 में कोका-कोला के अधिग्रहण के बाद बदली कहानी
गोल्ड स्पॉट की कहानी में बड़ा मोड़ 1993 में आया। रिपोर्ट के अनुसार, कोका-कोला ने थम्स अप, लिम्का और माजा के साथ गोल्ड स्पॉट को भी अधिग्रहित कर लिया। इसके बाद भारतीय बाजार में पेय ब्रांडों की रणनीति बदलने लगी। कोका-कोला के पोर्टफोलियो में कई पेय ब्रांड शामिल थे। गोल्ड स्पॉट को बाजार से हटाने के पीछे फैंटा जैसे ब्रांड के लिए जगह बनाने की रणनीति का उल्लेख किया जाता है। इसके बाद गोल्ड स्पॉट की बिक्री बंद हो गई और धीरे-धीरे यह बाजार से गायब हो गया। जो ब्रांड कभी दुकानों पर आसानी से नजर आता था, वह नई पीढ़ी के लिए एक पुरानी याद बनकर रह गया। आज उपभोक्ताओं को संतरे के स्वाद वाली ड्रिंक के कई विकल्प मिलते हैं, लेकिन गोल्ड स्पॉट से जुड़ी यादें उन लोगों के लिए अलग महत्व रखती हैं, जिन्होंने इसे अपने बचपन या युवावस्था में पिया था।
बाजार से गायब, लेकिन यादों में आज भी जिंदा
गोल्ड स्पॉट की कहानी केवल एक कोल्ड ड्रिंक की सफलता और बाजार से विदाई की कहानी नहीं है। यह उस दौर के भारतीय विज्ञापन जगत, फिल्मी सितारों के प्रभाव और बदलती उपभोक्ता पसंद की झलक भी दिखाती है। रेखा के विज्ञापनों से लेकर बोतलों के ढक्कन जमा करने वाले बच्चों तक, इस ब्रांड ने कई पीढ़ियों की यादों में जगह बनाई। बाद में युवा ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए इसकी ब्रांडिंग बदली गई, लेकिन 1993 के अधिग्रहण के बाद इसका सफर बाजार में आगे नहीं बढ़ सका। आज गोल्ड स्पॉट दुकानों पर उपलब्ध नहीं है, फिर भी इसका नाम सुनते ही कई लोगों को पुरानी दुकानों, बर्फ में ठंडी होती बोतलों और गर्मियों की छुट्टियों की याद आ सकती है। यही किसी पुराने लोकप्रिय ब्रांड की खासियत है—उत्पाद बाजार से गायब हो सकता है, लेकिन उससे जुड़ा दौर लोगों की यादों में बना रहता है।
