नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस की साइबर यूनिट ने एक अंतरराज्यीय साइबर ठगी गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए उसके मास्टरमाइंड सहित तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि गिरोह का सरगना एक निजी बैंक में कस्टमर रिलेशनशिप ऑफिसर के पद पर कार्यरत था और बैंकिंग सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर फर्जी बैंक खाते खोलने में मदद करता था।
पुलिस के अनुसार यह गिरोह साइबर अपराधियों को फर्जी फर्मों और व्यक्तियों के नाम पर खुले बैंक खाते कमीशन के बदले उपलब्ध कराता था। इन खातों का इस्तेमाल ऑनलाइन ठगी से प्राप्त रकम को ट्रांसफर करने और उसे छिपाने के लिए किया जाता था। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक पीएचडी छात्र से हुई साइबर ठगी की शिकायत की जांच के दौरान पुलिस इस गिरोह तक पहुंची।
गिरफ्तार आरोपियों से बड़ी बरामदगी
पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से सात मोबाइल फोन, 14 सिम कार्ड, दो पासबुक, छह चेकबुक, सात डेबिट कार्ड और एक पेटीएम स्वाइपिंग मशीन बरामद की है। बरामद सामग्री से यह संकेत मिला है कि गिरोह बैंक खातों के संचालन और साइबर ठगी से जुड़े लेनदेन को व्यवस्थित तरीके से संचालित कर रहा था।
जांच में यह भी खुलासा हुआ कि गिरोह का सरगना बैंक में कस्टमर रिलेशनशिप ऑफिसर के पद पर कार्यरत था। वह बैंकिंग प्रक्रियाओं की जानकारी का दुरुपयोग कर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खाते खुलवाता था। खाता खुलने के बाद उससे संबंधित वेलकम किट, चेकबुक और खाते से लिंक सिम कार्ड साइबर ठगों को लगभग 10 प्रतिशत कमीशन पर उपलब्ध कराए जाते थे।
मनी ट्रेल से खुला गिरोह का नेटवर्क
पुलिस ने बताया कि ठगी के मामले में जब मनी ट्रेल की जांच शुरू की गई तो पता चला कि ठगी की रकम का एक हिस्सा सिटी यूनियन बैंक में एक रेडीमेड गारमेंट्स फर्म के खाते में ट्रांसफर किया गया था। जांच में सामने आया कि इस खाते का प्रोपराइटर करोल बाग निवासी इसराफिल अंसारी बताया गया था, लेकिन जांच के दौरान यह पता पूरी तरह फर्जी निकला।
इसके बाद पुलिस ने लगभग 100 मोबाइल नंबरों, आईएमईआई नंबरों और बैंक खातों की डिटेल खंगाली। तकनीकी जांच और वित्तीय लेनदेन की कड़ियों को जोड़ने पर गिरोह के संचालन का तरीका सामने आया और पुलिस आरोपियों तक पहुंचने में सफल रही।
पीएचडी छात्र को निवेश के नाम पर ठगा गया
मामले की शुरुआत बुराड़ी निवासी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक पीएचडी छात्र अखिल सिंह द्वारा नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज कराई गई शिकायत से हुई थी। शिकायतकर्ता ने बताया कि वह शेयर मार्केट ट्रेडिंग टिप्स देने वाले एक टेलीग्राम ग्रुप से जुड़ा था।
ग्रुप में एक लिंक साझा किया गया था, जिसमें 5,000 रुपये के निवेश पर 20,000 रुपये के मुनाफे का दावा किया गया था। पीड़ित ने 3 अक्टूबर 2025 को 5,000 रुपये ट्रांसफर कर दिए। इसके बाद ठगों ने उसे बताया कि उसके खाते में 60,000 रुपये का मुनाफा हुआ है, लेकिन रकम निकालने के लिए अलग-अलग मदों में भुगतान करना होगा।
ठगों के झांसे में आकर पीड़ित ने कुल 1,66,467 रुपये ट्रांसफर कर दिए। बाद में न तो उसे मूलधन मिला और न ही कोई मुनाफा। रकम मिलने के बाद आरोपियों ने पीड़ित को ब्लॉक कर दिया।
छापेमारी में गिरफ्तारी और सरगना तक पहुंच
जांच के दौरान पुलिस ने 2 जून को रोहिणी और बुध विहार स्थित तीन ठिकानों पर छापेमारी कर 22 वर्षीय चिराग और 48 वर्षीय अमर यादव को गिरफ्तार किया। पूछताछ और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर पुलिस को गिरोह के सरगना के बारे में जानकारी मिली।
इसके बाद 8 जुलाई को मोती नगर में छापेमारी कर 28 वर्षीय नितेश कुमार को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार नितेश कुमार बंधन बैंक में अधिकारी के रूप में कार्यरत था और वही गिरोह का मुख्य संचालक था।
जांच जारी, अन्य कड़ियों की तलाश
दिल्ली पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस गिरोह के नेटवर्क में और कितने लोग शामिल थे तथा देश के किन-किन राज्यों में फर्जी खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी के लिए किया गया। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि आरोपी बैंकिंग सिस्टम की किन खामियों का फायदा उठाकर खाते खुलवा रहे थे।
अधिकारियों का कहना है कि गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के आधार पर गिरोह से जुड़े अन्य सदस्यों की पहचान की जा रही है। साथ ही साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराए गए बैंक खातों और उनमें हुए लेनदेन की विस्तृत जांच की जा रही है।
