हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा अनुशासित, जिम्मेदार और अच्छे संस्कारों वाला बने। यही वजह है कि बचपन से ही बच्चों को नियम-कायदे, शिष्टाचार और जिम्मेदारियों का महत्व सिखाया जाता है। लेकिन कई बार अनुशासन सिखाने की कोशिश में माता-पिता अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिनका असर बच्चे के व्यवहार, आत्मविश्वास और मानसिक विकास पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अनुशासन का उद्देश्य बच्चे को डराना नहीं, बल्कि सही और गलत की समझ विकसित करना होना चाहिए।
हर छोटी गलती पर चिल्लाना पड़ सकता है भारी
जब बच्चा कोई गलती करता है या शरारत करता है, तो कई माता-पिता तुरंत गुस्से में ऊंची आवाज में डांटना शुरू कर देते हैं। लगातार चिल्लाने से बच्चा डरने लगता है और धीरे-धीरे अपनी बातें माता-पिता से छिपाने लगता है। उसे यह महसूस होने लगता है कि गलती होने पर उसे केवल डांट ही मिलेगी। ऐसे में वह खुलकर अपनी समस्या या भावनाएं साझा नहीं कर पाता। इसलिए बच्चे को शांत तरीके से समझाना अधिक प्रभावी माना जाता है।
पसंदीदा चीजें छीन लेना हमेशा सही तरीका नहीं
अक्सर माता-पिता अनुशासन सिखाने के लिए बच्चे को बाहर खेलने, टीवी देखने या वीडियो गेम खेलने से रोक देते हैं। उन्हें लगता है कि इससे बच्चा अपनी गलती दोबारा नहीं करेगा। लेकिन जरूरत से ज्यादा रोक-टोक बच्चे में निराशा और गुस्सा पैदा कर सकती है। इससे उसका स्वभाव चिड़चिड़ा और जिद्दी भी हो सकता है। इसलिए सजा देने के बजाय बच्चे को उसके व्यवहार का कारण समझाना बेहतर विकल्प माना जाता है।
गुस्से में हाथ उठाना छोड़ दें
कुछ माता-पिता गुस्से में बच्चे पर हाथ उठा देते हैं और मानते हैं कि इससे वह अनुशासित हो जाएगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार मारने या शारीरिक दंड देने से बच्चे के मन में डर के साथ-साथ नाराजगी भी पैदा हो सकती है। इससे उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है और वह माता-पिता से भावनात्मक रूप से दूर भी हो सकता है। अनुशासन का सबसे अच्छा तरीका संवाद और धैर्य है, न कि शारीरिक दंड।
हर समय टोकना भी बन सकता है समस्या
कुछ घरों में बच्चों को हर छोटी बात पर टोका जाता है। जूते सही जगह रखो, कपड़े ठीक से रखो, प्लेट उठाकर रखो या पानी क्यों गिराया जैसी बातें अगर हर समय डांट के साथ कही जाएं, तो बच्चा मानसिक दबाव महसूस करने लगता है। कई बार वह जानबूझकर वही गलती दोहराने लगता है। यदि इन्हीं बातों को प्यार और धैर्य के साथ समझाया जाए तो बच्चा उन्हें आसानी से सीख सकता है।
दूसरे बच्चों से तुलना करना सबसे बड़ी भूल
कई माता-पिता अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से करते हैं। वे कहते हैं कि पड़ोस का बच्चा ज्यादा समझदार है, रिश्तेदार का बेटा पढ़ाई में अच्छा है या किसी और का व्यवहार बेहतर है। ऐसी तुलना बच्चे के आत्मसम्मान को चोट पहुंचा सकती है। वह खुद को कमजोर समझने लगता है और उसके मन में हीन भावना पैदा हो सकती है। इतना ही नहीं, वह उस दूसरे बच्चे और अपने माता-पिता दोनों के प्रति नकारात्मक भावना भी विकसित कर सकता है।
रिसर्च क्या कहती है?
विभिन्न शोध बताते हैं कि जिन बच्चों पर लगातार चिल्लाया जाता है, डांटा जाता है या उन्हें शारीरिक दंड दिया जाता है, उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे बच्चों में तनाव, आत्मविश्वास की कमी और व्यवहार संबंधी समस्याएं विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए सकारात्मक अनुशासन अपनाना अधिक लाभदायक माना जाता है।
प्यार और संवाद से सिखाएं अनुशासन
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे प्यार और अपनापन सबसे जल्दी समझते हैं। यदि उन्हें अच्छे और बुरे व्यवहार के बीच का अंतर शांतिपूर्वक समझाया जाए, तो वे उसे आसानी से स्वीकार करते हैं। खेल, कहानियों और रोजमर्रा के उदाहरणों के माध्यम से भी बच्चों में अनुशासन की भावना विकसित की जा सकती है। माता-पिता का अपना व्यवहार भी बच्चों के लिए सबसे बड़ा उदाहरण होता है।
हर बच्चा होता है अलग
यह समझना भी जरूरी है कि हर बच्चे की सीखने की क्षमता और व्यक्तित्व अलग होता है। कोई बच्चा जल्दी सीखता है तो किसी को थोड़ा अधिक समय लगता है। ऐसे में धैर्य बनाए रखना और बच्चे की छोटी-छोटी उपलब्धियों की सराहना करना उसके आत्मविश्वास को मजबूत बनाता है। लगातार आलोचना करने के बजाय सकारात्मक प्रोत्साहन देना अधिक प्रभावी होता है।
घर का माहौल भी निभाता है अहम भूमिका
बच्चों का व्यवहार काफी हद तक घर के वातावरण से प्रभावित होता है। यदि परिवार में सम्मान, प्रेम और सहयोग का माहौल होगा, तो बच्चा भी वही व्यवहार सीखता है। इसलिए अनुशासन केवल नियम बनाने से नहीं, बल्कि माता-पिता के व्यवहार और पारिवारिक माहौल से भी विकसित होता है।
