ereer | Source: erereपटना: बिहार में पंचायत चुनाव के आरक्षण को लेकर पटना हाईकोर्ट ने बुधवार, 26 अगस्त 2026 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों के पूर्वज करीब 100 या 125 साल पहले बिहार आकर बस गए थे, उन्हें केवल इस आधार पर बिहार का बाहरी निवासी नहीं माना जा सकता। ऐसे लोगों को आरक्षण के अधिकार से सिर्फ पूर्वजों के मूल राज्य के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत के इस फैसले का सीधा लाभ सहरसा जिले की साहुरिया पंचायत के निर्वाचित मुखिया मो. ईसा को मिला है।

सहरसा के मुखिया की कुर्सी पर आया बड़ा फैसला

यह मामला सहरसा के साहुरिया पंचायत के मुखिया मो. ईसा से जुड़ा है। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने जाति स्क्रूटनी कमेटी की 11 अप्रैल 2025 को जारी रिपोर्ट और राज्य निर्वाचन आयोग के 25 जून 2025 के आदेश को रद्द कर दिया।

राज्य निर्वाचन आयोग ने मो. ईसा का मुखिया पद का चुनाव रद्द कर दिया था। आयोग की ओर से यह आधार लिया गया था कि उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश से बिहार आए थे। इसी वजह से उन्हें अत्यंत पिछड़ा वर्ग यानी ईबीसी के लिए निर्धारित आरक्षण का लाभ मिलने पर सवाल उठाया गया था।

125 साल पहले उत्तर प्रदेश से बिहार आए थे पूर्वज

मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि मो. ईसा के पूर्वज करीब 125 साल पहले उत्तर प्रदेश से बिहार आकर बस गए थे। हाईकोर्ट ने इस तथ्य को आधार बनाकर उन्हें बिहार से बाहर का निवासी मानने से इनकार कर दिया।

अदालत ने साफ किया कि किसी परिवार के पूर्वज कई दशक पहले दूसरे राज्य से आकर बिहार में बस गए हों, तो सिर्फ इसी तथ्य के आधार पर उस परिवार के वर्तमान सदस्य को बिहार का बाहरी निवासी नहीं माना जा सकता। लंबे समय से बिहार में रहने वाले ऐसे परिवारों के अधिकारों को केवल पूर्वजों के मूल स्थान के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।

पंचायत चुनाव में किस कानून के आधार पर तय होगा आरक्षण?

पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि पंचायत चुनाव में आरक्षण के मामले में बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 15(5) लागू होगी। अदालत ने कहा कि इस मामले में बिहार आरक्षण अधिनियम, 1991, जिसमें वर्ष 2003 में संशोधन किया गया था, को आधार बनाना उचित नहीं था।

इस कानूनी पहलू को ही मामले में महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि मो. ईसा के चुनाव को रद्द करने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से जिस आधार का इस्तेमाल किया गया था, हाईकोर्ट ने उसे सही नहीं माना।

जाति जांच में भी मो. ईसा को EBC माना गया था

मामले में जाति प्रमाणपत्र की जांच से जुड़ी रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण रही। अदालत के सामने बताया गया कि तीन सदस्यीय जाति जांच कमेटी ने अपनी पहली रिपोर्ट में मो. ईसा को तेली (मुस्लिम) यानी अत्यंत पिछड़ा वर्ग का सदस्य माना था।

बाद की रिपोर्ट में भी जांच कमेटी ने उनके जाति प्रमाणपत्र को फर्जी नहीं बताया था। साथ ही कमेटी की ओर से यह भी नहीं कहा गया था कि मो. ईसा किसी दूसरी जाति से संबंधित हैं। इसके बावजूद उनके मुखिया चुनाव को रद्द कर दिया गया था।

राज्य निर्वाचन आयोग का आदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द

पटना हाईकोर्ट ने मामले में राज्य निर्वाचन आयोग के आदेश की कानूनी वैधता पर भी विचार किया। अदालत ने पाया कि मुखिया का चुनाव रद्द करते समय आयोग ने ऐसे कानूनी प्रावधान को आधार बनाया, जो इस मामले में लागू नहीं था।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग के 25 जून 2025 के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही जाति स्क्रूटनी कमेटी की 11 अप्रैल 2025 की रिपोर्ट को भी रद्द कर दिया गया। इस फैसले के बाद मो. ईसा को अपने निर्वाचित मुखिया पद के मामले में बड़ी राहत मिली है।

फैसले से क्या स्पष्ट हुआ?

पटना हाईकोर्ट के इस फैसले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि किसी व्यक्ति के पूर्वजों का मूल निवास स्थान अकेले यह तय करने का आधार नहीं हो सकता कि वर्तमान निवासी बिहार का है या बाहरी। खास तौर पर तब, जब संबंधित परिवार लंबे समय से बिहार में रह रहा हो और मामला पंचायत चुनाव में आरक्षण से जुड़ा हो।

अदालत ने पंचायत चुनाव में आरक्षण के लिए लागू कानूनी प्रावधानों को भी स्पष्ट किया। फैसले ने यह रेखांकित किया कि चुनावी अधिकार और आरक्षण से जुड़े मामलों में संबंधित कानून के सही प्रावधानों के आधार पर ही निर्णय लिया जाना चाहिए।

मो. ईसा के लिए फैसला क्यों है अहम?

सहरसा के साहुरिया पंचायत के निर्वाचित मुखिया मो. ईसा के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य निर्वाचन आयोग के आदेश के कारण उनका मुखिया चुनाव रद्द कर दिया गया था। उनके मामले में उनके पूर्वजों के उत्तर प्रदेश से बिहार आने को आरक्षण के अधिकार से जोड़कर देखा गया था।

अब पटना हाईकोर्ट ने आयोग के आदेश को रद्द करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि करीब 125 साल पहले पूर्वजों के दूसरे राज्य से बिहार आने मात्र से किसी वर्तमान निवासी को बाहरी नहीं माना जा सकता। साथ ही अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में पंचायत चुनाव से संबंधित बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 15(5) को आधार बनाया जाना चाहिए।