ereer | Source: eereनई दिल्ली। सफलता की राह हमेशा आसान नहीं होती। कई बार आर्थिक मुश्किलें इंसान के सामने ऐसे सवाल खड़े कर देती हैं, जहां पढ़ाई जारी रखना भी चुनौती बन जाता है। लेकिन अगर हौसला और मेहनत बनी रहे तो वही संघर्ष आगे चलकर पहचान की वजह बन सकता है। दिल्ली की सरकारी प्राथमिक शिक्षिका सुमन गोयल की कहानी इसका प्रभावशाली उदाहरण है। कभी अपनी कॉलेज की फीस भरने के लिए वह प्रतिदिन सिर्फ 60 रुपये में बच्चों को पढ़ाती थीं। आज वही सुमन गोयल उसी स्कूल में सरकारी शिक्षिका के रूप में बच्चों का भविष्य संवार रही हैं, जहां से उन्होंने खुद 12वीं की पढ़ाई पूरी की थी। अब उनके इसी समर्पण और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने जा रहा है।

आर्थिक संकट के कारण बदली पढ़ाई की राह

हरियाणा के जींद जिले के जुलाना गांव की रहने वाली सुमन गोयल की शुरुआती शिक्षा गांव में हुई। बचपन में उनका सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन 10वीं कक्षा के बाद परिवार आर्थिक संकट से गुजरने लगा। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें दिल्ली आना पड़ा। उन्होंने वर्ष 2002 में 12वीं की परीक्षा पास की, लेकिन इसके बाद भी परिवार की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। ऐसे में उच्च शिक्षा हासिल करना उनके लिए आसान नहीं था।

सुमन ने दिल्ली के उत्तर-पश्चिम बी-1 क्षेत्र में रोहिणी के पूठ कलां स्थित सर्वोदय कन्या विद्यालय से अपनी पढ़ाई की थी। पढ़ाई में वह शुरू से ही मेहनती थीं और 12वीं कक्षा में अपने स्कूल की टॉपर भी रही थीं। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में बीए में दाखिला लिया। कॉलेज पहुंचने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पढ़ाई का खर्च जुटाने की थी।

कॉलेज की फीस के लिए रोजाना ₹60 में पढ़ाने लगीं

अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए सुमन ने किसी के सामने आर्थिक मदद के लिए हाथ फैलाने के बजाय खुद कमाने का रास्ता चुना। उन्होंने उसी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, जहां से उन्होंने 12वीं की शिक्षा प्राप्त की थी। वर्ष 2004 तक उन्हें प्रतिदिन 60 रुपये के हिसाब से मेहनताना मिलता था। इस तरह वह महीने में लगभग 1,200 से 1,300 रुपये तक कमा लेती थीं।

यह रकम उस समय उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इसी कमाई से वह अपनी कॉलेज की फीस भरती थीं। एक ओर वह खुद उच्च शिक्षा हासिल कर रही थीं और दूसरी ओर छोटे बच्चों को पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल रही थीं। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने शिक्षा का रास्ता नहीं छोड़ा।

जिस स्कूल ने पढ़ाया, वहीं लौटकर बच्चों को पढ़ाने लगीं

कॉलेज की पढ़ाई के दौरान स्कूल के शिक्षकों से उन्हें लगातार मार्गदर्शन मिलता रहा। इन्हीं शिक्षकों ने उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रेरित किया। सुमन ने इस अवसर को गंभीरता से लिया और सरकारी शिक्षक बनने की दिशा में तैयारी शुरू की।

वर्ष 2009 में उन्हें स्थायी सरकारी नौकरी मिल गई। इसके बाद वर्ष 2013 से वह उसी स्कूल में प्राथमिक शिक्षिका के रूप में सेवाएं दे रही हैं, जहां उन्होंने कभी छात्रा के तौर पर पढ़ाई की थी। इस तरह जिस विद्यालय ने उनकी शिक्षा की नींव मजबूत की, उसी विद्यालय में वापस आकर उन्होंने बच्चों को शिक्षित करने की जिम्मेदारी संभाली।

खुद को क्यों कहती हैं ‘मदर टीचर’

सुमन गोयल केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक खुद को सीमित नहीं रखतीं। वह अपने विद्यार्थियों को परिवार के बच्चों की तरह समझने और उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों को जानने पर जोर देती हैं। इसी वजह से वह खुद को ‘मदर टीचर’ मानती हैं।

उनके मुताबिक वह अपने विद्यार्थियों के परिवारों से परिचित हैं और यह जानकारी उन्हें बच्चों को बेहतर तरीके से समझने तथा पढ़ाने में मदद करती है। पूठ कलां, कृष्ण विहार और मांगे राम पार्क जैसे इलाकों से आने वाले कई बच्चे अपने परिवार में पहली पीढ़ी के विद्यार्थी हैं। उनके माता-पिता में बड़ी संख्या दिहाड़ी मजदूरों की है। ऐसी परिस्थितियों में बच्चों की शैक्षणिक जरूरतों के साथ उनकी सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों को समझना भी जरूरी हो जाता है।

किताबों से आगे बच्चों के स्वेटर, स्टेशनरी और सेहत का भी ध्यान

सुमन गोयल का मानना है कि जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा केवल कक्षा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। वह बच्चों की जरूरत के अनुसार उनके स्वेटर, स्टेशनरी, स्वास्थ्य और पोषण का भी ध्यान रखती हैं। उनका प्रयास रहता है कि आर्थिक परिस्थितियों की वजह से कोई बच्चा पढ़ाई से पीछे न रह जाए।

उनकी शिक्षण पद्धति में कमजोर विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। वह ऐसे बच्चों की मदद के लिए सहपाठी समूह आधारित तरीके का इस्तेमाल करती हैं, जिसमें बच्चे एक-दूसरे की सीखने में मदद करते हैं। इससे कमजोर बच्चों को कक्षा की गतिविधियों में शामिल होने और सीखने में आसानी होती है।

विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए भी अपनाती हैं अलग तरीका

सुमन विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों को भी कक्षा के वातावरण में सहज बनाने पर जोर देती हैं। उनका कहना है कि प्रत्येक कक्षा में लगभग चार से पांच बच्चे ऐसे होते हैं, जिन्हें अन्य विद्यार्थियों की तुलना में अधिक व्यक्तिगत ध्यान की आवश्यकता होती है।

इसी सोच के साथ उन्होंने ‘निपुण मैथ्स किट’ विकसित की। इस शिक्षण सामग्री का उद्देश्य बच्चों के लिए गणित को अधिक सहज और समझने योग्य बनाना है। उनकी तैयार की गई निपुण मैथ्स किट को राज्य स्तर पर भी सराहना मिली है।

माता-पिता को खोने के बाद पति बने मजबूत सहारा

सुमन गोयल के जीवन में संघर्ष कम उम्र से ही शुरू हो गया था। उन्होंने कम उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया था। इसके बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई और करियर का सफर जारी रखा। शादी के बाद उनके पति गौरव ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए पूरा सहयोग दिया।

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए आवेदन की प्रक्रिया लगभग दो से तीन महीने तक चलती है। इस दौरान उनके पति ने घर पर सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी सुविधाएं जुटाने में मदद की और उन्हें आवेदन करने के लिए प्रेरित किया। परिवार के सहयोग ने सुमन को इस प्रक्रिया में आगे बढ़ने का हौसला दिया।

2022 में राज्य पुरस्कार, अब राष्ट्रीय सम्मान

शिक्षा के क्षेत्र में सुमन गोयल के योगदान को पहले भी सम्मान मिल चुका है। वर्ष 2022 में उन्हें स्टेट टीचर्स अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। अब करीब 20 वर्षों से अधिक समय तक शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय रहने के बाद उनका चयन नेशनल टीचर्स अवॉर्ड 2026 के लिए किया गया है।

दिल्ली के रोहिणी स्थित जीएसकेवी पूठ कलां स्कूल की प्राथमिक शिक्षिका सुमन गोयल को 5 सितंबर को विज्ञान भवन में सम्मानित किया जाएगा। इस उपलब्धि ने उनके उस सफर को एक खास मुकाम दिया है, जिसकी शुरुआत कभी अपनी कॉलेज फीस जुटाने के लिए प्रतिदिन 60 रुपये में बच्चों को पढ़ाने से हुई थी।

₹60 से राष्ट्रीय सम्मान तक पहुंची प्रेरक यात्रा

सुमन गोयल की कहानी केवल एक शिक्षक के पुरस्कार जीतने की कहानी नहीं है। यह उस संघर्ष की कहानी है, जिसमें आर्थिक मुश्किलों के बावजूद एक छात्रा ने अपनी पढ़ाई जारी रखी, बच्चों को पढ़ाकर अपनी फीस जुटाई और बाद में उसी विद्यालय में सरकारी शिक्षिका बनकर लौट आई।

आज वह बच्चों को सिर्फ किताबों का ज्ञान नहीं दे रही हैं, बल्कि उनकी पारिवारिक परिस्थितियों, जरूरतों और सीखने की अलग-अलग क्षमताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा देने का प्रयास कर रही हैं। वर्ष 2022 का राज्य स्तरीय सम्मान और अब नेशनल टीचर्स अवॉर्ड 2026 उनके लंबे शैक्षणिक सफर में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं।

संघर्ष से सम्मान तक की कहानी

सुमन गोयल का सफर दिखाता है कि आर्थिक कठिनाइयां किसी व्यक्ति की मंजिल तय नहीं करतीं। कभी जिस विद्यालय में वह छात्रा के रूप में पढ़ती थीं, वहीं से अपने कॉलेज की फीस जुटाने के लिए बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और आगे चलकर उसी संस्थान में सरकारी प्राथमिक शिक्षिका के रूप में सेवा देने लगीं। अब 5 सितंबर को विज्ञान भवन में मिलने वाला राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार उनके इसी लंबे सफर और शिक्षा के प्रति समर्पण को सम्मानित करेगा।