पांच राज्यों- पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी, में हुए विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति की एक अहम परत को उजागर किया है: मुस्लिम प्रतिनिधित्व का बदलता चेहरा। कुल 824 सीटों में से 107 मुस्लिम उम्मीदवारों का जीतकर विधानसभा पहुंचना एक तरफ जहां उनकी मौजूदगी को दर्शाता है, वहीं दूसरी तरफ यह भी बताता है कि यह प्रतिनिधित्व अभी भी असमान रूप से बंटा हुआ है। दिलचस्प बात यह रही कि भारतीय जनता पार्टी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा, जिससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि मुख्यधारा की राजनीति में इस समुदाय की भागीदारी किन रास्तों से तय हो रही है।



बंगाल: सबसे बड़ी मौजूदगी, लेकिन बदलते संकेत

294 सीटों वाले पश्चिम बंगाल में इस बार 40 मुस्लिम विधायक चुने गए। यह संख्या भले सबसे ज्यादा है, लेकिन पिछली बार के मुकाबले इसमें गिरावट आई है। खास बात यह रही कि अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की मुस्लिम विधायकों में कमी आई, जबकि छोटे दलों और अन्य विपक्षी पार्टियों की हिस्सेदारी बढ़ी। यह संकेत देता है कि मुस्लिम वोट अब एकतरफा नहीं रहा और उसमें बिखराव की शुरुआत हो चुकी है।


केरल: स्थिरता और मजबूत प्रतिनिधित्व

140 सीटों वाले केरल में 35 मुस्लिम विधायक जीतकर आए, जो कुल संख्या का लगभग एक चौथाई है। यहां संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा का दबदबा साफ नजर आया, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की मजबूत भूमिका रही। केरल का पैटर्न यह दिखाता है कि जहां संगठित राजनीतिक प्रतिनिधित्व और स्थिर गठबंधन होते हैं, वहां समुदाय की हिस्सेदारी भी संतुलित रहती है।



असम: गिरावट के पीछे बदलते समीकरण

असम में 22 मुस्लिम विधायक चुने गए, जो पिछली बार के मुकाबले काफी कम है। यहां एक दिलचस्प रुझान यह रहा कि कांग्रेस के अधिकांश विजेता मुस्लिम समुदाय से आए। साथ ही ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और अन्य छोटे दलों की भी सीमित मौजूदगी रही। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, परिसीमन और बदले सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों ने इस गिरावट में बड़ी भूमिका निभाई है।


तमिलनाडु और पुडुचेरी: सीमित प्रतिनिधित्व की कहानी


तमिलनाडु में 234 सीटों में से सिर्फ 9 मुस्लिम विधायक जीत सके, जो उनकी आबादी के अनुपात में काफी कम है। यहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और तमिलगा वेत्री कड़गम के बीच यह प्रतिनिधित्व बंटा रहा। वहीं पुडुचेरी में स्थिति और भी सीमित रही, जहां 30 सीटों में से केवल एक मुस्लिम विधायक ही जीत पाया। यह साफ संकेत है कि छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राजनीतिक दलों द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों को सीमित अवसर दिए जा रहे हैं।



बड़ा संकेत: प्रतिनिधित्व बनाम हिस्सेदारी

कुल मिलाकर 107 मुस्लिम विधायकों का आंकड़ा यह बताता है कि प्रतिनिधित्व मौजूद है, लेकिन समान रूप से नहीं। जहां केरल और बंगाल जैसे राज्यों में यह मजबूत है, वहीं तमिलनाडु और पुडुचेरी में बेहद कमजोर नजर आता है। सबसे अहम बात यह रही कि भारतीय जनता पार्टी के खाते में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है, क्योंकि पार्टी ने किसी को टिकट ही नहीं दिया।


यह चुनावी तस्वीर एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है- क्या मुस्लिम प्रतिनिधित्व अब क्षेत्रीय दलों और गठबंधनों पर ही निर्भर होता जा रहा है? और क्या राष्ट्रीय स्तर पर उनकी राजनीतिक भागीदारी का स्वरूप बदल रहा है? आने वाले चुनावों में इसके संकेत और साफ हो सकते हैं।