erer | Source: ererनई दिल्ली। मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यूजी (NEET UG) को देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में गिना जाता है। हर वर्ष लाखों छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन सीमित एमबीबीएस सीटों के कारण बहुत कम अभ्यर्थियों का सपना पूरा हो पाता है। अधिकांश छात्र एक-दो प्रयास के बाद हार मान लेते हैं, लेकिन बिहार के पटना निवासी सौरव सिंह ने हार को अपनी मंजिल नहीं बनने दिया। लगातार पांच बार असफल होने और कई कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बाद उन्होंने छठे प्रयास में ऐसा प्रदर्शन किया कि हर कोई उनकी सफलता की कहानी जानना चाहता है।

पहले प्रयास में मिली निराशा, तैयारी से ज्यादा मस्ती में बीता समय

सौरव ने वर्ष 2019 में पहली बार नीट परीक्षा दी थी। उस समय उनकी तैयारी परीक्षा के स्तर के अनुरूप नहीं थी। नियमित पढ़ाई के बजाय दोस्तों के साथ घूमना और समय का सही उपयोग न कर पाना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया। परिणामस्वरूप उन्हें केवल 295 अंक मिले। फिजिक्स विषय में उनका प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। उस समय उनके अधिकांश मित्र भी सफल नहीं हुए, इसलिए उन्हें अपनी असफलता का अधिक अहसास नहीं हुआ।

कोरोना काल में सोशल मीडिया ने बढ़ा दी मुश्किलें

कोविड-19 महामारी के दौरान पढ़ाई ऑनलाइन हो गई, लेकिन सौरव इस अवसर का लाभ नहीं उठा सके। पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाय वे सोशल मीडिया और परीक्षा टलने से जुड़ी चर्चाओं में समय बिताते रहे। अगले प्रयास में उनके अंक बढ़कर 480 तक पहुंचे, लेकिन यह स्कोर एमबीबीएस सीट के लिए पर्याप्त नहीं था। इस दौरान उनके कई साथी मेडिकल कॉलेज पहुंच गए, जिससे उन्हें अपनी कमियों का एहसास हुआ।

लगातार तीसरी असफलता ने तोड़ा आत्मविश्वास

तीसरे प्रयास में भी सौरव अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सके। लगातार असफल होने के बावजूद उन्होंने अपना लक्ष्य नहीं बदला। उन्होंने समझ लिया कि केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि सही रणनीति भी सफलता के लिए जरूरी है।

फिजिक्स सुधारी, लेकिन एक गलती फिर भारी पड़ गई

चौथे प्रयास की तैयारी के दौरान उन्होंने फिजिक्स और केमिस्ट्री पर विशेष ध्यान दिया। ऑनलाइन अध्ययन के माध्यम से उन्होंने फिजिक्स की बुनियाद मजबूत की और एनसीईआरटी की मदद से केमिस्ट्री पर पकड़ बनाई। हालांकि एक बड़ी कमी बनी रही—उन्होंने नियमित मॉक टेस्ट नहीं दिए। परीक्षा के दिन घबराहट के कारण कई आसान प्रश्नों में गलतियां हो गईं। उन्हें 565 अंक मिले और ऑल इंडिया रैंक लगभग 39 हजार रही। इस रैंक पर एमबीबीएस सीट मिलना संभव नहीं था।

परिवार के आग्रह पर उन्होंने बिहार वेटरनरी कॉलेज में बीवीएससी (BVSc) पाठ्यक्रम में प्रवेश ले लिया, लेकिन उनका मन वहां नहीं लगा।

बीवीएससी में पढ़ाई जारी रही, लेकिन सपना सिर्फ एमबीबीएस का था

कॉलेज में दाखिला लेने के बाद भी सौरव डॉक्टर बनने का सपना नहीं भूल पाए। उन्होंने कुछ समय की छुट्टी लेकर फिर से नीट की तैयारी शुरू की। इस बार उन्होंने हर मॉक टेस्ट दिया और अपनी गलतियों को लिखने के लिए एक विशेष नोटबुक तैयार की। तैयारी पहले से बेहतर थी, लेकिन परीक्षा से पहले उन गलतियों का पर्याप्त पुनरावलोकन नहीं कर सके।

इस प्रयास में उनके 598 अंक आए, लेकिन प्रतियोगिता बढ़ने के कारण उनकी रैंक लगभग 30 हजार रही। अच्छे अंक होने के बावजूद उन्हें एमबीबीएस सीट नहीं मिली। यह असफलता उनके लिए बेहद भावुक करने वाली रही।

परिवार से छिपकर शुरू की आखिरी लड़ाई

बीवीएससी के पहले वर्ष में उनका शैक्षणिक प्रदर्शन भी अच्छा रहा। लेकिन जब व्यावहारिक प्रशिक्षण के दौरान उन्हें पशुओं के साथ काम करना पड़ा, तब उन्हें महसूस हुआ कि उनका वास्तविक सपना डॉक्टर बनना ही है।

परिवार इस बार दोबारा तैयारी के पक्ष में नहीं था। ऐसे में उन्होंने किसी को बताए बिना गुप्त रूप से छठे प्रयास की तैयारी शुरू कर दी। प्रतिदिन सुबह जल्दी लाइब्रेरी पहुंचकर घंटों अध्ययन करना उनकी दिनचर्या बन गया। इस बार उन्होंने पिछली सभी गलतियों को सुधारा और नियमित अभ्यास जारी रखा।

परीक्षा वाले दिन हुई बड़ी गलती, फिर भी नहीं टूटा आत्मविश्वास

नीट परीक्षा के दिन सौरव से एक बड़ी भूल हो गई। वे रोल नंबर की जगह आवेदन संख्या देखकर गलत परीक्षा कक्ष में पहुंच गए। परीक्षा शुरू होने से कुछ ही समय पहले उन्हें अपनी गलती का पता चला। जल्दबाजी में सही केंद्र तक पहुंचने के बाद भी उन्होंने घबराहट को खुद पर हावी नहीं होने दिया।

मानसिक संतुलन बनाए रखते हुए उन्होंने पूरी एकाग्रता से परीक्षा दी और शानदार प्रदर्शन किया।

छठे प्रयास में रच दिया इतिहास

कई वर्षों की मेहनत, असफलताओं से मिली सीख और मजबूत इच्छाशक्ति का परिणाम आखिरकार सामने आया। सौरव ने 720 में से 680 अंक हासिल किए, जो सरकारी एमबीबीएस सीट प्राप्त करने के लिए पर्याप्त थे।

जब उन्होंने यह सफलता अपने परिवार को बताई तो खुशी का माहौल बन गया। जिन लोगों ने कभी उन्हें दूसरा रास्ता चुनने की सलाह दी थी, वे भी उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति की सराहना करने लगे।

सौरव की कहानी क्यों बनी लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा

सौरव सिंह की यात्रा यह साबित करती है कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि धैर्य, अनुशासन, सही रणनीति और लगातार प्रयास से मिलती है। लगातार पांच बार असफल होने के बाद भी उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उनकी कहानी उन सभी विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा है जो किसी परीक्षा में असफल होने के बाद खुद को कमजोर समझने लगते हैं।

यह संघर्ष यह संदेश देता है कि यदि गलतियों से सीख लेकर लगातार आगे बढ़ा जाए तो देर से ही सही, सफलता एक दिन जरूर मिलती है।