erere | Source: ererनई दिल्ली। कमांडो की जिंदगी आम लोगों की दिनचर्या से बिल्कुल अलग होती है। बेहद कठिन शारीरिक प्रशिक्षण, लंबे समय तक लगातार काम करने की क्षमता, सीमित संसाधनों में गुजारा और विपरीत परिस्थितियों में खुद को संभालना उनकी ट्रेनिंग का हिस्सा होता है। पूर्व एनएसजी कमांडो और शौर्य चक्र से सम्मानित कर्नल कौशल कश्यप ने अलग-अलग साक्षात्कारों में स्पेशल फोर्सेज की ट्रेनिंग, फिटनेस और सर्वाइवल डाइट से जुड़े अपने अनुभव साझा किए हैं। उनके बताए अनुभवों में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ऐसी परिस्थितियों में उपलब्ध भोजन के रूप में कीड़े, मेंढक और सांप तक का इस्तेमाल है।

48 घंटे या उससे ज्यादा चलने वाले ऑपरेशन के लिए फिटनेस

कर्नल कौशल कश्यप के मुताबिक कमांडो की फिटनेस ऐसी होनी चाहिए कि वह लंबे ऑपरेशन के दौरान लगातार काम कर सके। उन्होंने बताया कि एक ऑपरेशन 48 घंटे तक चल सकता है और कई बार इससे ज्यादा समय भी लग सकता है। ऐसे में कमांडो के लिए लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक रूप से सक्रिय रहना जरूरी होता है।

उन्होंने यह भी बताया कि प्रशिक्षण का बुनियादी हिस्सा लंबे समय तक काम करने की क्षमता विकसित करना है। उनके अनुसार कमांडो को दिन-रात लगातार काम करने और बेहद कम नींद में भी अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार किया जाता है।

स्पेशल फोर्सेज की ट्रेनिंग का मकसद क्या होता है?

कर्नल कौशल कश्यप ने स्पेशल फोर्सेज की करीब 90 दिन की ट्रेनिंग को बेहद कठिन बताया। उनके अनुसार इस प्रशिक्षण का उद्देश्य जवान की शारीरिक और मानसिक क्षमता को कठिन से कठिन परिस्थितियों के लिए तैयार करना होता है।

उन्होंने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि प्रशिक्षण शुरू होने के शुरुआती दिनों में ही जवानों को बेहद कठिन शारीरिक गतिविधियों से गुजरना पड़ता है। शुरुआत में करीब 20 किलोमीटर दौड़, उसके बाद सीमित आराम और कक्षाएं होती हैं। शाम को फिर दौड़ और रात में ड्यूटी जैसी गतिविधियां प्रशिक्षण का हिस्सा रहती हैं।

पहले ही दिन 20 किलोमीटर दौड़, फिर पीठ पर वजन

कर्नल कश्यप के अनुसार प्रशिक्षण के शुरुआती दौर में पहले दिन करीब 20 किलोमीटर दौड़ कराई जाती थी। अगले दिन करीब 10 किलोमीटर दौड़ होती थी। इसके बाद पीठ पर वजन लेकर 8 से 9 किलोमीटर तक दौड़ने जैसी गतिविधियां भी कराई जाती थीं।

उनके मुताबिक जो लोग इस स्तर की कठिन ट्रेनिंग के लिए तैयार नहीं होते, वे शुरुआती चरण में ही प्रशिक्षण छोड़ देते हैं। प्रशिक्षण का उद्देश्य जवानों की सहनशक्ति और मुश्किल परिस्थितियों में काम करने की क्षमता को मजबूत करना होता है।

700 से 800 पुशअप और कई तरह की शारीरिक चुनौतियां

कर्नल कौशल कश्यप ने बताया कि प्रशिक्षण में सुबह करीब डेढ़ घंटे की शारीरिक कसरत होती थी। इसके बाद वजन के साथ गतिविधियां, 700 से 800 पुशअप, रस्सी पर चढ़ना और अलग-अलग बाधाओं को पार करने का अभ्यास कराया जाता था।

इसके अलावा रोजाना करीब 30 से 40 मिनट का निहत्थे मुकाबले का अभ्यास भी प्रशिक्षण का हिस्सा बताया गया। इन गतिविधियों के बाद जवान नाश्ते के लिए जाते थे। इस तरह दिन की शुरुआत ही बेहद कठिन शारीरिक मेहनत से होती थी।

मिशन में चॉकलेट भी बन सकती है सबसे जरूरी चीज

कमांडो के रक्सैक में सबसे जरूरी सामान क्या होता है, इस सवाल पर कर्नल कश्यप ने बताया कि यह मिशन की प्रकृति पर निर्भर करता है। यदि किसी अभियान में बहुत ज्यादा चलना या शारीरिक मेहनत करनी हो तो चॉकलेट जैसी चीज भी काफी उपयोगी साबित हो सकती है।

उन्होंने बताया कि चॉकलेट तुरंत ऊर्जा देने का एक साधन बन सकती है। ऐसे मिशन में छोटी-सी ऊर्जा देने वाली खाद्य सामग्री भी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।

rerere | Source: eeसर्वाइवल ट्रेनिंग में सांप, मेंढक और कीड़े भी भोजन का हिस्सा

कर्नल कश्यप ने अपनी ट्रेनिंग के दौरान सर्वाइवल ईटिंग का अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण का एक उद्देश्य यह होता है कि जरूरत पड़ने पर जवान उपलब्ध संसाधनों के आधार पर भोजन की व्यवस्था कर सके।

उन्होंने उत्तर-पूर्व के कोहिमा स्थित कीड़ा बाजार का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां अलग-अलग प्रकार के कीड़े उपलब्ध होते हैं। उनके अनुसार प्रशिक्षण के दौरान सांप से लेकर कई प्रकार के कीड़े और मेंढक तक खाने का अनुभव कराया गया।

erer | Source: ererयह बात सामान्य खानपान से बिल्कुल अलग लग सकती है, लेकिन कर्नल कश्यप ने इसे सर्वाइवल ट्रेनिंग के संदर्भ में बताया। इसका उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार करना है, जहां सामान्य भोजन उपलब्ध न हो।

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कीड़ों में पोषण होने की बात भी कही

कर्नल कश्यप ने इंटरव्यू में कीड़ों को पोषण से भरपूर बताते हुए कहा कि सर्वाइवल परिस्थितियों में उपलब्ध भोजन के विकल्पों को समझना जरूरी है। उन्होंने बताया कि अलग-अलग स्थानों पर भोजन की उपलब्धता अलग होती है और ऐसी परिस्थितियों में शरीर को ऊर्जा देने वाले विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

उन्होंने सांप के मांस के संबंध में भी अपने अनुभव साझा किए और कहा कि प्रशिक्षण में उसे सर्वाइवल फूड के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि जंगली जीवों को खाना स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्थानीय कानूनों से जुड़े जोखिमों के कारण सामान्य खानपान का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

मिशन के लिए पूड़ी, भुना चावल और सत्तू

लंबे मिशन के दौरान साथ ले जाने वाले भोजन के बारे में कर्नल कश्यप ने कई पारंपरिक खाद्य पदार्थों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पूड़ियां दो-तीन दिन तक चल सकती हैं, जबकि एक विशेष तरह का भुना हुआ चावल कई महीनों तक खाने के लिए रखा जा सकता है।

उन्होंने व्यक्तिगत रूप से सत्तू को पसंदीदा विकल्प बताया। उनके अनुसार सत्तू में चीनी मिलाकर बोतल में रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर पानी मिलाकर तुरंत सेवन किया जा सकता है। इससे पेट भरने के साथ ऊर्जा भी मिलती है।

कमांडो की जिंदगी से क्या सीख मिलती है?

कर्नल कौशल कश्यप के अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि कमांडो प्रशिक्षण केवल ताकत बढ़ाने तक सीमित नहीं होता। इसमें लंबे समय तक मेहनत करने की क्षमता, सीमित संसाधनों में काम करना, मानसिक मजबूती, अनुशासन और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना भी शामिल होता है।

उनकी बताई ट्रेनिंग में लंबी दौड़, भारी शारीरिक अभ्यास, बाधाओं को पार करना, निहत्थे मुकाबले का प्रशिक्षण और सर्वाइवल फूड जैसी गतिविधियां शामिल रही हैं। यही कठिन अभ्यास विशेष बलों के जवानों को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के लिए तैयार करने में भूमिका निभाता है।