भारत की विदेश नीति, रूस से तेल आयात और पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति को लेकर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का एक बयान सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। सहारनपुर से सांसद मसूद ने रूस से तेल खरीद पर अमेरिका की भूमिका का जिक्र करते हुए तंज भरे अंदाज में कहा कि "तेल तब लेंगे, जब अब्बाजान परमिशन देंगे।" उनके इस बयान ने राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया है। एक ओर कांग्रेस सांसद केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर भाजपा और सरकार समर्थक इसे भारत की कूटनीतिक स्थिति को गलत तरीके से पेश करने की कोशिश बता रहे हैं।
रूस, अमेरिका और भारत की ऊर्जा नीति पर उठाए सवाल
इमरान मसूद का मुख्य निशाना केंद्र सरकार की विदेश नीति और ऊर्जा रणनीति रही। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से दूर होता जा रहा है और महत्वपूर्ण आर्थिक फैसलों पर विदेशी दबाव बढ़ रहा है। मसूद का दावा है कि अमेरिका के दबाव के कारण भारत को ऊर्जा क्षेत्र में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसका असर आम लोगों पर पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के रूप में दिखाई दे सकता है। हालांकि केंद्र सरकार लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया था। सरकार का कहना है कि तेल खरीद का फैसला किसी राजनीतिक दबाव के बजाय आर्थिक लाभ और राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर लिया जाता है।
ईरान को लेकर भी केंद्र सरकार पर साधा निशाना
रूस के मुद्दे के अलावा इमरान मसूद ने पश्चिम एशिया की स्थिति और ईरान के साथ भारत के संबंधों को लेकर भी सरकार पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि ईरान लंबे समय से भारत का मित्र देश रहा है और संकट के समय दोनों देशों के संबंध मजबूत रहे हैं। मसूद ने आरोप लगाया कि क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया अपेक्षित स्तर की नहीं रही, जिससे पारंपरिक मित्र देशों में नाराजगी बढ़ सकती है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर भारत को लगातार संतुलित कूटनीतिक रणनीति अपनानी पड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत एक साथ अमेरिका, रूस, ईरान और खाड़ी देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है, इसलिए उसकी विदेश नीति अक्सर बहु-आयामी संतुलन पर आधारित होती है।
गाय और बीफ निर्यात पर भी उठाए सवाल
अपने बयान के दौरान इमरान मसूद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गौ-संरक्षण संबंधी बयानों पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि गाय को माता का दर्जा दिया जाता है, तो उसकी उम्र के आधार पर अलग-अलग नियम क्यों लागू किए जाते हैं। साथ ही उन्होंने बीफ निर्यात और पशु वध से जुड़े नियमों को लेकर भी सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए। यह मुद्दा लंबे समय से भारतीय राजनीति में संवेदनशील विषय रहा है, जहां धार्मिक आस्था, पशुपालन अर्थव्यवस्था और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन को लेकर लगातार बहस होती रही है।
बयान से बढ़ी राजनीतिक गर्मी
इमरान मसूद अपने बेबाक और कई बार विवादित बयानों के लिए पहले भी चर्चा में रह चुके हैं। इस बार उनका "अब्बाजान परमिशन देंगे" वाला बयान विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच नई राजनीतिक बहस का कारण बन गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक कूटनीतिक संतुलन और घरेलू राजनीतिक विमर्श जैसे बड़े मुद्दे मौजूद हैं। आने वाले दिनों में इस बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज हो सकती हैं, खासकर तब जब रूस से तेल आयात, अमेरिका की नीतियां और पश्चिम एशिया की स्थिति पहले से ही राष्ट्रीय बहस के महत्वपूर्ण विषय बने हुए हैं।
