प्रेग्नेंसी के दौरान लोग अक्सर पौष्टिक भोजन, आराम और बच्चे की ग्रोथ पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन इसी बीच एक छोटा सा टेस्ट कई बार नजरअंदाज हो जाता है. यह टेस्ट सिर्फ दो मिनट में पूरा हो जाता है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि यही छोटी जांच मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद जरूरी साबित हो सकती है. यहां बात हो रही है ब्लड प्रेशर टेस्ट की, जिसे कई महिलाएं इसलिए गंभीरता से नहीं लेतीं क्योंकि उन्हें कोई परेशानी महसूस नहीं होती.
दुनियाभर में मातृ मृत्यु की बड़ी वजह
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, प्रेग्नेंसी के दौरान हाई ब्लड प्रेशर और खासकर प्रीक्लेम्पसिया जैसी समस्याएं दुनियाभर में मातृ मृत्यु की बड़ी वजहों में शामिल हैं. सबसे चिंता की बात यह है कि यह समस्या कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ती रहती है. महिला सामान्य महसूस करती है, लेकिन शरीर के अंदर दबाव लगातार बढ़ रहा होता है.
दो मिनट से भी कम समय में हो जाता है टेस्ट
आर्टेमिस हॉस्पिटल की ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी विभाग की चेयरपर्सन डॉ. रेनू रैना सहगल के मुताबिक, डिजिटल या मैनुअल बीपी मॉनिटर की मदद से सिस्टोलिक और डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर की जांच की जाती है. इस प्रक्रिया में
दो मिनट से भी कम समय लगता है. यह जांच बताती है कि प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर खुद को किस तरह संभाल रहा है और कहीं कोई खतरा तो नहीं बढ़ रहा.
कब बढ़ जाता है खतरा?
कुछ मामलों में डॉक्टर रोल-ओवर टेस्ट भी करते हैं, खासकर 28 से 32 हफ्तों की प्रेग्नेंसी के दौरान. पिंकी प्रॉमिस की कंसल्टेंट गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. विनती मनियार बताती हैं कि इस टेस्ट में महिला पहले बाईं करवट लेटती है और फिर पीठ के बल होती है. अगर डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर 20 mmHg या उससे ज्यादा बढ़ जाए, तो इसे खतरे का संकेत माना जाता है. इससे डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिलती है कि ब्लड वेसल्स सही तरीके से काम कर रही हैं या नहीं.
मां और बच्चे दोनों पर पड़ सकता है असर
प्रेग्नेंसी में हाई बीपी का असर सिर्फ मां तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बच्चे की सेहत पर भी पड़ सकता है. अगर समय पर इसका पता न चले, तो प्लेसेंटा तक खून का प्रवाह कम हो सकता है. इससे बच्चे को पर्याप्त ऑक्सीजन और जरूरी पोषण नहीं मिल पाता. ऐसी स्थिति में लो बर्थ वेट, समय से पहले डिलीवरी, दौरे पड़ना और कई गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ की रिसर्च के मुताबिक, समय रहते जांच और नियमित मॉनिटरिंग सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है.
सिर्फ बीपी टेस्ट ही नहीं, दूसरी जांच भी जरूरी
डॉक्टर केवल ब्लड प्रेशर टेस्ट पर ही निर्भर नहीं रहते. डॉ. विनती मनियार इसे “एसेंशियल ट्रायो” बताती हैं, जिसमें यूरिन एल्ब्यूमिन टेस्ट, यूरिक एसिड, क्रिएटिनिन जैसे ब्लड मार्कर्स और प्लेटलेट काउंट शामिल होते हैं. इन जांचों से यह पता चलता है कि किडनी, ब्लड और शरीर के दूसरे अंग सही तरीके से काम कर रहे हैं या नहीं.
डॉक्टरों का कहना है कि प्रेग्नेंसी के दौरान हर छोटी जांच बेहद अहम होती है. दो मिनट का यह ब्लड प्रेशर टेस्ट सिर्फ एक सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
