बिहार की न्यायपालिका के दिल में तनाव बढ़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के बाद राज्य की सबसे बड़ी अदालत पटना हाई कोर्ट की कार्यप्रणाली इस वक्त सुर्ख़ियों में इसलिए है क्योंकि जजों और वकीलों के बीच लंबे समय से बिगड़ते रिश्तों ने अब प्रत्यक्ष विरोध का रूप ले लिया है।वकीलों ने सोमवार को पूरी अदालत का बहिष्कार करने का ऐलान किया है, जिससे न्यायिक कामकाज पर सीधा असर पड़ेगा। इस फैसले ने न सिर्फ़ अदालत के भीतर बल्कि बाहर भी सियासी और सामाजिक बहस को जन्म दिया है।


बीते कुछ हफ्तों में पटना हाई कोर्ट के कोर्टरूम में जजों और वकीलों के बीच कई मौकों पर तनाव की खबरें सामने आई थीं।वकीलों का आरोप है कि सुनवाई के दौरान उनसे अपमानजनक व्यवहार किया गया, उनकी बात नहीं सुनी गई और कोर्ट के भीतर उन्हें कड़ी फटकार का सामना करना पड़ा।

वहीं अदालत प्रशासन का कहना है कि कोर्ट के अनुशासन और गरिमा को बनाए रखना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है, और इस दिशा में कदम उठाना आवश्यक है।विशेष रूप से एक मामले के दौरान अधिकारियों और वकीलों के बीच शब्दों की तीखी टक्कर हुई, जिससे हार्ड फीलिंग्स पैदा हो गईं। वकीलों ने आगे कहा कि ऐसी स्थितियाँ बार-बार उत्पन्न हो रही हैं, जिससे उनकी पेशेवर गरिमा और मानसिक संतुलन पर असर पड़ा है।


इस विवाद के बढ़ते स्वरूप को देखते हुए पटना हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने एक आपात बैठक बुलाई। बैठक में वकीलों ने पिछले कुछ घटनाक्रमों की समीक्षा करते हुए यह निर्णय लिया कि अगर उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो वे कोर्ट कार्यभार से दूरी बनाएंगे।बार एसोसिएशन की घोषणा के अनुसार सोमवार पूरा दिन वकील अदालत में पेश नहीं होंगे। किसी भी मामले की पैरवी नहीं होगी।नई फ़ाइलिंग को भी रोक दिया गया है।

इस बहिष्कार का मकसद अदालत प्रशासन और न्यायाधीशों को यह संदेश देना है कि वकीलों के मुद्दों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, अन्यथा न्यायिक कामकाज प्रभावित होगा।


सोमवार को कोर्ट का बहिष्कार कई तरह के प्रत्यक्ष प्रभाव दिखा सकता है:

आरजीसी/जमानत मामलों की सुनवाई प्रभावित होगी।अर्जेंट स्टे या पेशी जैसे मामलों में देरी आने की संभावना है।

रोज़मर्रा के केस जैसे दीवानी या दंडात्मक मामलों में सर्वर की कमी का सामना करना पड़ेगा।नागरिकों को सुनवाई के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।विशेषज्ञों का कहना है कि कोर्ट के बहिष्कार का असर सभी पक्षों पर पड़ेगा न सिर्फ़ वकीलों पर या न्यायालय प्रशासन पर। वहीं, आम जनता भी अदालत के नियमित कामकाज के बाधित होने से प्रभावित हो सकती है।


जहाँ एक तरफ़ बार एसोसिएशन ने अपने विरोध को स्पष्ट कर दिया है, वहीं अदालत प्रशासन ने कुछ बयान प्रकाशित नहीं किया है, लेकिन कोर्ट के भीतर से यह खबर मिली है कि उच्च न्यायिक अफसर मामले को शांत करने और बातचीत के लिए तैयार हैं।

सूत्रों के अनुसार, वरिष्ठ न्यायाधीशों और वकील प्रतिनिधियों के बीच संवाद की कोशिशें भी शुरू हो चुकी हैं। अदालत प्रशासन का मानना है कि न्यायिक गरिमा और वकील-विधि पेशे की गरिमा दोनों को बराबर रूप से सम्मान देना ज़रूरी है।


राजनीतिक और सामाजिक विशेषज्ञों के मुताबिक इस तरह के विवाद के कई कारण हो सकते हैं

प्रशासनिक व्यवहार बनाम व्यावसायिक गरिमा

वकील यह मानते हैं कि कोर्ट के भीतर उनका सम्मान नहीं किया जाता, जबकि प्रशासन का कहना है कि सुनवाई क्रम की शालीनता बनाए रखना सर्वोपरि है।

पेशे की तनावपूर्ण प्रकृति

वकीलों का कहना है कि अदालत में दिन-प्रतिदिन व्यापक दबाव और कोर्ट प्रक्रिया का तनाव उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित कर रहा है।

संवाद की कमी

बार एसोसिएशन का आरोप है कि साधारण मुद्दों पर भी बातचीत नहीं होती, जिससे झुंझलाहट बढ़ती है।

सभी विश्लेषण यह दर्शाते हैं कि यह केवल एक साधारण नोकझोंक नहीं, बल्कि मूलभूत न्यायिक व्यवहार, गरिमा और संवाद की कमी का परिणाम है।


बार एसोसिएशन ने साफ़ कहा है कि बहिष्कार को तभी समाप्त किया जाएगा जब विवाद के कारणों का स्पष्ट समाधान निकाला जाए कोर्ट के भीतर व्यवहार और अनुशासन की रूप-रेखा तय हो वकीलों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए।अदालत प्रशासन और वरिष्ठ न्यायाधीशों से बातचीत जारी है, लेकिन फिलहाल कोर्ट बहिष्कार की स्थिति कायम है और सोमवार के दिन हाई कोर्ट के कामकाज पर बड़ा असर पड़ेगा।