दूध को हमेशा से संपूर्ण आहार माना गया है, लेकिन हाल की कुछ स्टडीज ने इसे लेकर नई बहस छेड़ दी है। खासकर पार्किंसन रोग के संदर्भ में यह सवाल उठ रहा है कि क्या ज्यादा दूध पीना जोखिम बढ़ा सकता है।

कई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च में यह पाया गया है कि जो लोग रोजाना अधिक मात्रा में डेयरी प्रोडक्ट्स, विशेषकर लो-फैट या स्किम्ड दूध का सेवन करते हैं, उनमें पार्किंसन का खतरा कुछ हद तक ज्यादा देखा गया। कुछ अध्ययनों में पुरुषों में यह जोखिम 20 से 40 प्रतिशत तक अधिक पाया गया है। हालांकि वैज्ञानिक साफ तौर पर कहते हैं कि यह केवल एक संबंध है, न कि सीधा कारण।

विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे कई संभावित वजहें हो सकती हैं। दूध में मौजूद कीटनाशकों के अवशेष, जैसे हेप्टाक्लोर एपॉक्साइड, दिमाग पर असर डाल सकते हैं। इसके अलावा गैलेक्टोज नामक तत्व भी एक कारण माना जा रहा है, जो अधिक मात्रा में लेने पर न्यूरोलॉजिकल प्रभाव डाल सकता है। एक और महत्वपूर्ण पहलू “गट-ब्रेन कनेक्शन” है, जहां आंतों का स्वास्थ्य दिमाग की कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है।

इसके बावजूद डॉक्टर यह सलाह नहीं देते कि लोग तुरंत दूध पीना बंद कर दें। दूध में कैल्शियम, प्रोटीन और कई जरूरी पोषक तत्व होते हैं, जो शरीर के लिए आवश्यक हैं। मुख्य बात है संतुलन बनाए रखना।

पार्किंसन के लक्षणों में हाथ कांपना, शरीर में जकड़न, धीमी चाल और संतुलन की समस्या शामिल हैं। शुरुआती संकेतों में नींद की परेशानी, कब्ज और सूंघने की क्षमता कम होना भी देखा जा सकता है।

अंत में, स्वस्थ जीवनशैली, संतुलित आहार और नियमित व्यायाम ही बीमारी के जोखिम को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।