कई दशकों तक जन्मजात बहरेपन का कोई स्थाई इलाज नहीं था। ऐसे बच्चे जो पैदा होते ही आवाज़ें नहीं सुन पाते थे, उनके लिए डॉक्टरों के पास एकमात्र विकल्प कोक्लियर इम्प्लांट जैसे उपकरण होते थे, जो सुनने में मदद तो करते थे लेकिन प्राकृतिक सुनने की शक्ति वापस नहीं ला पाते थे।जन्म से बहरे बच्चों के माता-पिता के सामने यह कठोर सच होता था कि

“इलाज नहीं है, सिर्फ सहायक तकनीक है।”

लेकिन अब स्थिति बदल रही है। पहली बार वैज्ञानिकों ने ऐसा तरीका विकसित किया है जो इन बच्चों को स्वाभाविक सुनने की क्षमता वापस दे सकता है।


वैज्ञानिकों ने एक विशेष जीन-थेरेपी इंजेक्शन विकसित किया है जो कान के अंदर खराब जीन को उसकी सही कॉपी से बदल देता है।

यह इंजेक्शन कान की हेयर सेल्स को दोबारा सक्रिय करता है।इससे बच्चे धीरे-धीरे ध्वनियों को पहचानने लगते हैं।कुछ मामलों में शब्दों को समझने की क्षमता भी विकसित हो रही है।


यह थेरेपी विशेष रूप से उन बच्चों के लिए है जिनमें OTOF gene mutation की वजह से जन्म से सुनने की क्षमता नहीं होती।इस स्थिति में बच्चे की कोक्लिया सामान्य होती है, लेकिन आवाज़ को दिमाग तक पहुंचाने वाला जीन सही काम नहीं करता।


शोधकर्ताओं ने बताया कि इंजेक्शन देने के कुछ ही हफ्तों में बच्चे आवाज़ों पर प्रतिक्रिया देने लगे।कई बच्चे अब हल्की आवाजें भी सुन पा रहे हैं।कुछ मामलों में उनकी सुनने की क्षमता सामान्य बच्चों के स्तर के करीब पहुँचती दिख रही है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह अब तक की सबसे सफल जीन-थेरेपी उपलब्धि है।


श्रवण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह थेरेपी बड़े स्तर पर भी सफल रहती है,तो आने वाले वर्षों में जन्मजात बहरेपन का स्थाई इलाज संभव हो सकता है।यह उपचार अभी शुरुआती परीक्षणों में है।अगर आगे के ट्रायल सुरक्षित और सफल रहे,तो अगले 2–3 वर्षों में इसे आम मरीजों के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है।