बिहार की राजनीति में मंगलवार का दिन एक भावनात्मक मोड़ लेकर आया। करीब दो दशकों तक सत्ता की धुरी रहे नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ने से पहले अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक की—एक ऐसी बैठक, जिसमें सिर्फ फैसले नहीं, बल्कि एक दौर के अंत की गूंज भी सुनाई दी।
कैबिनेट कक्ष में माहौल सामान्य नहीं था। यह केवल प्रशासनिक औपचारिकता भर नहीं थी, बल्कि उन वर्षों की स्मृतियों का संगम था, जब बिहार ने राजनीतिक स्थिरता और विकास के कई पड़ाव देखे। बैठक के अंत में जब नीतीश कुमार बोले, तो उनके शब्दों में अनुभव, संतुलन और एक तरह की विरासत का भाव साफ झलक रहा था।
उन्होंने कहा—
"आगे बिहार में जो नई सरकार बनेगी, उसका मैं सहयोग करूंगा। मेरा मार्गदर्शन मिलता रहेगा। बिहार में काफी काम हुआ है, आगे भी होगा। आप लोग मिल-जुलकर अच्छे से काम करिए।"
यह संबोधन किसी विदाई भाषण जैसा नहीं, बल्कि एक वरिष्ठ राजनेता की ओर से नई पीढ़ी को सौंपा गया भरोसा था।
भावनाओं से भरी विदाई
बैठक खत्म होने के बाद मंत्रिमंडल के सदस्यों की आंखों में नमी थी। चिराग पासवान की पार्टी के मंत्री संजय सिंह ने बताया कि सभी ने नीतीश कुमार को पिछले 20 वर्षों तक राज्य की सेवा के लिए धन्यवाद दिया।
ग्रुप फोटो के दौरान भी माहौल भावुक रहा—जैसे इतिहास का एक अध्याय कैमरे में कैद हो रहा हो।
औपचारिक कदम, बड़ा बदलाव
बैठक में कैबिनेट भंग करने की सिफारिश की गई और यह तय हुआ कि इस्तीफे के साथ राज्यपाल को इसकी सूचना दी जाएगी। दोपहर 3:15 बजे नीतीश कुमार अपना इस्तीफा सौंपने वाले हैं—एक औपचारिक कदम, लेकिन इसके राजनीतिक मायने गहरे हैं।
अब सबकी नजर शाम 4 बजे होने वाली एनडीए विधायक दल की बैठक पर है, जहां नए मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान होना है।
सियासी हलचल और विपक्ष की प्रतिक्रिया
इस घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। कांग्रेस की ओर से स्नेहाशीष वर्धन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर सवाल बताते हुए कहा कि नीतीश कुमार "पलटी मारने के उस्ताद" हैं और भविष्य में नए समीकरण भी बन सकते हैं।
उन्होंने इशारों में यह भी कहा कि एनडीए के भीतर असंतोष की स्थिति बन सकती है, जिसमें चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और एन. चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं की भूमिका अहम हो सकती है।
एक युग का अंत, दूसरे की शुरुआत
नीतीश कुमार का यह कदम सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में संक्रमण का संकेत है। उनके कार्यकाल में राज्य ने कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं के क्षेत्र में कई बदलाव देखे।
अब सवाल यह है कि नई सरकार इस विरासत को कैसे आगे बढ़ाएगी—और क्या बिहार की सियासत स्थिरता की राह पर बनी रहेगी या नए गठबंधनों और समीकरणों का दौर शुरू होगा?
फिलहाल, पटना की हवा में एक ही सवाल तैर रहा है—
“अब आगे क्या?”
