राजधानी दिल्ली के लोगों के लिए एक बार फिर उम्मीद की खबर सामने आई है। वर्षों से प्रदूषण, बदबू और पर्यावरण संकट की पहचान बन चुके गाजीपुर, भलस्वा और ओखला लैंडफिल साइट यानी ‘कूड़े के पहाड़’ हटाने को लेकर नया लक्ष्य तय किया गया है। नगर निगम ने दावा किया है कि भलस्वा और ओखला लैंडफिल को 2026 के अंत तक और गाजीपुर लैंडफिल को 2027 के अंत तक पूरी तरह समतल करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, दिल्ली के लोग अब सवाल भी पूछ रहे हैं कि क्या इस बार वाकई तस्वीर बदलेगी या यह भी पहले के वादों जैसा साबित होगा।


Ghazipur Landfill, Bhalswa Landfill और Okhla Landfill लंबे समय से दिल्ली की सबसे बड़ी नागरिक और पर्यावरणीय चुनौतियों में गिने जाते रहे हैं। इन कूड़े के पहाड़ों के आसपास रहने वाले लोग वर्षों से जहरीली बदबू, धुएं, आग लगने की घटनाओं और स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत करते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन लैंडफिल साइटों से निकलने वाली जहरीली गैसें और धुआं आसपास के इलाकों की हवा को लगातार खराब करते हैं।

नगर निगम के मुताबिक, इन पहाड़ों को हटाने के लिए बायोमाइनिंग और बायोरिमेडिएशन तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में पुराने कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उसका निपटान या पुनः उपयोग किया जाता है। अधिकारियों का दावा है कि पिछले कुछ समय में काम की गति बढ़ाई गई है और रोजाना हजारों टन कचरे की प्रोसेसिंग की जा रही है।

दिल्ली के मेयर ने हाल ही में कहा कि ओखला और भलस्वा लैंडफिल को इस वर्ष के अंत तक समतल करने का लक्ष्य है, जबकि गाजीपुर के विशाल कूड़े के पहाड़ को 2027 के अंत तक खत्म करने की योजना है। अधिकारियों का कहना है कि नई मशीनें लगाई जा रही हैं ताकि पुराने और नए दोनों कचरे को अलग-अलग तेजी से प्रोसेस किया जा सके।

हालांकि, यह पहला मौका नहीं है जब ऐसी समयसीमा तय की गई हो। इससे पहले भी कई बार इन कूड़े के पहाड़ों को हटाने के दावे किए जा चुके हैं। पहले 2024, फिर 2028 और बाद में 2026 तक इन्हें खत्म करने की बात कही गई थी। लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से समयसीमा आगे बढ़ती गई। यही कारण है कि अब दिल्ली के कई लोग इस नए वादे को लेकर सतर्क नजर आ रहे हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ कूड़े के पहाड़ हटाना ही काफी नहीं होगा। असली चुनौती यह है कि दिल्ली हर दिन हजारों टन नया कचरा पैदा करती है। अगर कचरे की छंटाई, रीसाइक्लिंग और वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को मजबूत नहीं किया गया, तो भविष्य में फिर इसी तरह की समस्या पैदा हो सकती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इन लैंडफिल साइटों के कारण आसपास के इलाकों में रहना मुश्किल हो गया है। गर्मियों में बदबू और धुआं ज्यादा बढ़ जाता है, जबकि बारिश के मौसम में गंदा पानी और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। कई बार आग लगने की घटनाओं ने भी लोगों की चिंता बढ़ाई है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर सरकार और नगर निगम तय समयसीमा के भीतर इन कूड़े के पहाड़ों को हटाने में सफल होते हैं, तो इससे दिल्ली की हवा, स्वास्थ्य व्यवस्था और शहरी जीवन पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। कुछ जगहों पर लैंड रिक्लेमेशन के बाद नए इंफ्रास्ट्रक्चर और हरित क्षेत्र विकसित करने की योजनाओं पर भी चर्चा हो रही है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार दिल्ली वाकई अपने ‘कूड़े के पहाड़ों’ से छुटकारा पा सकेगी, या फिर यह वादा भी पुराने वादों की तरह सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा। आने वाले महीनों में जमीन पर दिखने वाली प्रगति ही इसका असली जवाब देगी।