नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में तेज गति से आगे बढ़ रही है, लेकिन मौजूदा विकास दर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक भारत को ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने के लक्ष्य के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। पिछली तिमाही में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7% से अधिक रहने का अनुमान है। इसके बावजूद अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि विकसित देश का दर्जा हासिल करने के लिए भारत को आने वाले वर्षों में कहीं अधिक तेज और लगातार आर्थिक वृद्धि बनाए रखनी होगी।
7% की रफ्तार भी क्यों पड़ सकती है कम?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य प्रमुख एजेंडे में शामिल है। 2047 में भारत की आजादी के 100 वर्ष पूरे होंगे और इसी समय तक देश को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए केवल 7% या 8% के आसपास की आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी।
देश के सबसे बड़े सरकारी थिंक-टैंक नीति आयोग के वरिष्ठ अधिकारी अशोक लाहिड़ी के अनुसार, दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को 2047 तक इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 21 वर्षों तक हर साल 9.25% की दर से बढ़ना होगा। इसका मतलब है कि भारत को लंबे समय तक ऐसी विकास दर बनाए रखनी होगी, जो पिछले कई दशकों के औसत से काफी अधिक है।
भारत की औसत विकास दर कितनी रही?
आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2000 से 2024 के बीच भारत की आर्थिक विकास दर औसतन 6.3% रही। वहीं, भारत की मौजूदा संभावित विकास दर 7.5% से 8% के बीच मानी जा रही है। यह दर भी मजबूत है, लेकिन 2047 के विकसित भारत लक्ष्य के लिए अनुमानित 9.25% की जरूरत से कम है।
पिछले 50 वर्षों के आंकड़े भी इस चुनौती को स्पष्ट करते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था केवल तीन बार—1975, 1988 और 2021 में—9.25% या उससे अधिक की दर से बढ़ी है। ऐसे में लगातार 21 वर्षों तक इस स्तर की वृद्धि बनाए रखना भारत के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती होगी।
अर्थशास्त्रियों ने क्यों जताई चिंता?
ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की लंदन स्थित अर्थशास्त्री एलेक्जेंड्रा हरमन प्रसाद के मुताबिक 2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि में काफी तेजी और निरंतरता जरूरी होगी। अर्थव्यवस्था जैसे-जैसे बड़ी होती जाती है, उसी गति से लगातार उच्च विकास दर हासिल करना और मुश्किल होता जाता है।
सोमवार को जारी होने वाले आंकड़ों से पिछली तिमाही की आर्थिक स्थिति की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है। अनुमान है कि पिछली तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले 7.3% बढ़ी। यह इससे पिछली तीन तिमाहियों में दर्ज 7.8% की औसत विकास दर से कम है।
8% से नीचे की वृद्धि भारत को कहां पहुंचा सकती है?
विशेषज्ञों के सामने एक और बड़ी चिंता ‘मिडिल-इनकम ट्रैप’ की है। इसका अर्थ ऐसी स्थिति से है, जब कोई देश निम्न आय वाली अर्थव्यवस्था से आगे निकल जाता है, लेकिन उत्पादकता, कौशल और उच्च मूल्य वाले रोजगार में पर्याप्त सुधार न होने के कारण उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था तक पहुंचने में अटक जाता है।
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक यदि भारत 8% से कम की विकास दर के दौर में फंसता है तो बढ़ती मजदूरी और लागत देश के कम लागत वाले आर्थिक लाभ को कमजोर कर सकती है। ऐसे में भारत के लिए विकसित और अमीर अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
प्रति व्यक्ति आय में भी बड़ी छलांग की जरूरत
विकसित देश बनने की चुनौती केवल कुल जीडीपी बढ़ाने तक सीमित नहीं है। प्रति व्यक्ति आय में भी बड़ा सुधार जरूरी होगा। नीति आयोग के अशोक लाहिड़ी के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 2,813 डॉलर थी।
उच्च आय वाले देश का दर्जा हासिल करने के लिए 2047 तक भारत की प्रति व्यक्ति आय को छह गुना से अधिक बढ़ाकर करीब 18,000 डॉलर तक पहुंचाना होगा। इसका मतलब है कि आर्थिक वृद्धि के साथ आम लोगों की आय और उत्पादकता में भी पर्याप्त बढ़ोतरी जरूरी होगी।
भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कौन-सी कमजोरियां?
ओवरसीज-चाइनीज बैंकिंग कॉर्प की अर्थशास्त्री लावण्या वेंकटेश्वरन ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कुछ कमजोरियों की ओर ध्यान दिलाया है। उनके मुताबिक देश के चालू खाते और बजट घाटे के साथ बाहरी संतुलन को वित्तपोषित करने के लिए अस्थिर पूंजी प्रवाह पर निर्भरता एक जोखिम है।
इसका असर विदेशी निवेशकों की धारणा पर भी पड़ सकता है। इस साल अब तक भारतीय रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में रहा है। वहीं, बैंक ऑफ अमेरिका कॉर्प के अगस्त के फंड मैनेजर सर्वे में भारत ने इंडोनेशिया को पीछे छोड़ते हुए एशिया के सबसे कम पसंद किए जाने वाले शेयर बाजार का स्थान हासिल किया।
मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना क्यों जरूरी?
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक भारत के लिए तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करने का एक महत्वपूर्ण रास्ता विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करना है। यह क्षेत्र मोदी सरकार के आर्थिक एजेंडे में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हालांकि, एक दशक से अधिक समय से भारत की जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 16% से 17% के आसपास बनी हुई है।
यह आंकड़ा सरकार के 25% के लक्ष्य से काफी नीचे है। ऐसे में भारत के सामने विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार करने और उसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ने की चुनौती बनी हुई है।
हाई-टेक एक्सपोर्ट और निजी निवेश पर जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को उच्च तकनीक वाले निर्यात को बढ़ावा देने, निजी निवेश में तेजी लाने और आयातित ऊर्जा पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम करना होगा। इन क्षेत्रों में सुधार से आर्थिक गतिविधियों को गति देने में मदद मिल सकती है।
वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2% से भी कम है, जबकि चीन की हिस्सेदारी 14% से अधिक है। यह अंतर बताता है कि वैश्विक औद्योगिक शक्ति बनने के लिए भारत को निर्यात और विनिर्माण के क्षेत्र में अभी लंबी दूरी तय करनी है।
विदेशी निवेश आकर्षित करना ही नहीं, रोकना भी चुनौती
भारत को अपने विनिर्माण क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित करने की भी जरूरत है। हाल ही में देश के दो सबसे वरिष्ठ मंत्रियों ने वैश्विक निवेशकों के सामने भारत की आर्थिक वृद्धि की संभावनाएं पेश कीं। इसके तहत अमेरिका, कनाडा और जापान से नई पूंजी आकर्षित करने की कोशिश की गई।
भारत ने रिकॉर्ड मात्रा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई आकर्षित किया है। हालांकि, चुनौती केवल विदेशी पूंजी लाने की नहीं, बल्कि उसे लंबे समय तक देश में निवेशित बनाए रखने की भी है। हाल के वर्षों में भारतीय कंपनियों ने विदेशों में अपना निवेश बढ़ाया है, जबकि भारतीय स्टार्टअप कंपनियों में विदेशी निवेशकों ने अपने पुराने निवेश से धन निकालना शुरू किया है।
घरेलू बचत भी निभाएगी अहम भूमिका
भारत की विकास संबंधी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए घरेलू बचत को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत में बचत दर वैश्विक औसत से अधिक है, लेकिन कई एशियाई देशों की तुलना में कम है और चीन के मुकाबले काफी पीछे है।
कम आय के कारण कई परिवार रोजमर्रा की जरूरतों और खर्चों के बाद पर्याप्त बचत नहीं कर पाते। घरेलू बचत महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इससे नई फैक्ट्रियों, बुनियादी ढांचे और अन्य निवेश परियोजनाओं के लिए अपेक्षाकृत सस्ती घरेलू पूंजी उपलब्ध होती है।
यदि घरेलू बचत में लगातार कमी आती है तो भारत को अपनी विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए महंगे कर्ज या विदेशी पूंजी पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।
युवाओं को रोजगार नहीं मिला तो डेमोग्राफिक डिविडेंड का फायदा छूट सकता है
भारत के पास दुनिया की बड़ी कामकाजी उम्र की आबादी है, जिसे अगले तीन दशकों तक आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। इसे ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ कहा जाता है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि युवाओं को पर्याप्त संख्या में बेहतर रोजगार और जरूरी कौशल नहीं मिले तो इस जनसांख्यिकीय लाभ को आर्थिक ताकत में बदलना मुश्किल हो सकता है।
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट में 2021 के सर्वे के आधार पर बताया गया कि 15 से 29 वर्ष की उम्र के करीब 8.7 करोड़ भारतीय न तो काम कर रहे थे और न ही पढ़ाई या प्रशिक्षण ले रहे थे। अच्छी नौकरियों की कमी के कारण करीब 60% कार्यबल को स्वरोजगार करना पड़ रहा है। इसमें बड़ी संख्या खेती से जुड़े लोगों की है, जहां आम तौर पर आय कम होती है।
6% से अधिक की वृद्धि बनाए रखना भी चुनौती?
ग्लोबलडेटा.टीएस लोम्बार्ड की मुख्य अर्थशास्त्री शुमिता देवेश्वर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता और सुधारों पर जोर देने वाली सरकार के बावजूद यह सवाल महत्वपूर्ण है कि निवेश चक्र इतने वर्षों से शुरुआती चरण में ही क्यों अटका हुआ है और शुद्ध एफडीआई लगभग शून्य के करीब क्यों है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि युवा और लगातार बढ़ती कार्यबल आबादी के लिए पर्याप्त नौकरियां क्यों नहीं बन रही हैं। उनके मुताबिक निजी निवेश और रोजगार में तेज बढ़ोतरी के बिना भारत के लिए 6% से अधिक की जीडीपी विकास दर को लंबे समय तक बनाए रखना भी मुश्किल हो सकता है। ऐसे में 8% से अधिक की विकास दर हासिल करना, जिसकी विकसित देश बनने के लिए जरूरत बताई जा रही है, और भी बड़ी चुनौती बन जाती है।
2047 के लक्ष्य के सामने बड़ी आर्थिक चुनौती
भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के लिए केवल मौजूदा 7% के आसपास की वृद्धि दर पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसके लिए लंबे समय तक 9.25% की सालाना विकास दर, प्रति व्यक्ति आय में बड़ा इजाफा, विनिर्माण और निर्यात में विस्तार, निजी निवेश में तेजी, पर्याप्त रोजगार और घरेलू बचत जैसे कई मोर्चों पर एक साथ प्रगति करनी होगी। यही वजह है कि मजबूत जीडीपी वृद्धि के बावजूद 2047 का विकसित भारत लक्ष्य भारत के सामने एक बड़ी और लंबी आर्थिक चुनौती बना हुआ है।
