नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को सुनवाई टल गई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता राकेश सिंह को निर्वाचन आयोग की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे पर अपना पक्ष रखने के लिए 10 दिन का समय दिया। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होने की संभावना है, हालांकि अंतिम तारीख अदालत की सूची के अनुसार तय होगी। सुनवाई के दौरान ऑडियो-वीडियो काफी देर तक बंद रहने की बात भी सामने आई है। इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोपों, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मतदाता सूची से जुड़े विवादों पर आगे विचार किया जाना है।
निर्वाचन आयोग का जवाब देर से आया, याचिकाकर्ता ने मांगा समय
मंगलवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता राकेश सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए समय देने का अनुरोध किया। उन्होंने बताया कि निर्वाचन आयोग ने अपना जवाबी हलफनामा पिछली रात ही दाखिल किया था। ऐसे में याचिकाकर्ता के लिए दस्तावेजों का अध्ययन करने और उसके बाद अपना जवाब यानी प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय जरूरी है।
अदालत ने इस मांग को स्वीकार करते हुए 10 दिन की मोहलत दे दी। इसके चलते मामले में फिलहाल आरोपों के गुण-दोष के आधार पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ। अब अगली सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब और निर्वाचन आयोग के पक्ष पर आगे विचार किया जा सकता है।
इस प्रकरण में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं की ओर से दायर याचिकाएं भी शामिल हैं। इन याचिकाओं में निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया और SIR के दौरान कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान काफी देर बंद रहा ऑडियो-वीडियो
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के एक बड़े हिस्से के दौरान अदालत की कार्यवाही का ऑडियो-वीडियो बंद कर दिया गया था। जब मामला समाप्त होने के करीब पहुंचा, तब ऑडियो-वीडियो फिर चालू किया गया। उस समय वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.एम. सिंघवी और मेनका गुरुस्वामी मौजूद दिखाई दिए। सुनवाई के दौरान फाइल नोटिंग और अन्य रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की मांग भी उठाई गई।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में ऑडियो-वीडियो बंद रहने की पूरी अवधि और इसके पीछे के विस्तृत कारणों की जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए इस घटनाक्रम को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। मामले की सुनवाई में उठाए गए मुद्दे निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड, निर्णय प्रक्रिया और SIR से जुड़े विवादों पर केंद्रित रहे।
फॉर्म-6 और निर्वाचन आयोग के प्रेस नोट पर भी उठे सवाल
इससे पहले याचिकाकर्ता सांसद डोला सेन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने अदालत के सामने निर्वाचन आयोग के कामकाज से जुड़े कुछ मुद्दे उठाए। उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म-6 में कथित छेड़छाड़ और निर्वाचन आयोग की ओर से जारी एक प्रेस नोट का उल्लेख किया।
याचिकाकर्ता पक्ष की दलील थी कि आयोग के प्रेस नोट में यह कहा गया था कि अदालत की पीठ ने कथित छेड़छाड़ को अधिकृत किया है। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत इस मामले की जांच करेगी।
इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा, जिसे मुख्य न्यायाधीश ने मंजूर कर लिया। सुनवाई से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को सभी याचिकाओं के संबंध में फिर से नोटिस जारी किया। मामले में अब संबंधित पक्षों के जवाब और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे की सुनवाई होगी।
क्या है पूरा विवाद? SIR और मतदाता सूची पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं का एक प्रमुख विषय विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की विस्तृत जांच कर उसमें आवश्यक सुधार किए जाते हैं। इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करना और सूची में मौजूद गलत या अपात्र प्रविष्टियों को ठीक करना है।
हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर याचिकाकर्ताओं ने पारदर्शिता और प्रक्रिया के पालन पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधित करने के दौरान कुछ मामलों में अनियमितताएं हो सकती हैं। उन्होंने यह आशंका भी जताई है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम उचित सूचना और सुनवाई के बिना हटा दिया जाता है, तो वह अपने मताधिकार से वंचित हो सकता है।
याचिकाओं में यह भी सवाल उठाया गया है कि SIR से संबंधित फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए और क्या निर्वाचन आयोग के सभी सदस्यों की सहमति से निर्णय किए गए थे। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि इन सवालों की जांच आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड, बैठकों के विवरण और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर की जाए।
निर्वाचन आयोग ने हलफनामे में क्या कहा?
निर्वाचन आयोग ने अपने जवाबी हलफनामे में एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि SIR से संबंधित निर्णय तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए थे और फॉर्म-6 में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया गया।
इस तरह मामले में याचिकाकर्ताओं और निर्वाचन आयोग के दावों के बीच अंतर दिखाई देता है। एक ओर याचिकाकर्ता निर्णय प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलाव और डिजिटल प्रणालियों के संचालन से जुड़े रिकॉर्ड की जांच चाहते हैं, वहीं आयोग ने अपने हलफनामे में आरोपों को नकारते हुए फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है।
सुप्रीम कोर्ट में अब इन दावों और उनके समर्थन में प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार किया जाना है। अदालत का अंतिम रुख सामने आने से पहले किसी भी आरोप को सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों को लेकर क्या है कानूनी सवाल?
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों से जुड़ा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को दी गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष होते हैं, जबकि अन्य चुनाव आयुक्त भी आयोग की व्यवस्था का हिस्सा हैं।
याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि क्या कुछ महत्वपूर्ण निर्णय पूरे आयोग की सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिए गए थे या उनमें किसी एक पदाधिकारी की भूमिका अधिक रही। उनका आग्रह है कि संबंधित फाइलों, बैठक के विवरण और आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच की जाए, ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया स्पष्ट हो सके।
निर्वाचन आयोग की ओर से दाखिल हलफनामे में SIR से जुड़े निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कही गई है। ऐसे में अदालत के सामने दोनों पक्षों के दावों और संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा। इस स्तर पर यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी आरोप की पुष्टि हो चुकी है।
राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं की याचिकाओं में क्या मांगें उठाई गई हैं?
इस मामले में राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली तथा SIR से जुड़े मुद्दों पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की गई है। याचिकाओं में मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया, फैसलों की पारदर्शिता और आयोग के रिकॉर्ड की जांच जैसे विषय शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं की प्रमुख मांगों में विवादित निर्णयों से संबंधित दस्तावेजों को अदालत के सामने पेश करना, मतदाता सूची में हुए बदलावों की जांच करना और नाम हटाने की प्रक्रिया के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध कराना शामिल है। कुछ याचिकाओं में स्वतंत्र जांच और डिजिटल प्रणालियों के संचालन की समीक्षा की मांग भी उठाई गई है।
इन मांगों पर अदालत को संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद विचार करना होगा। फिलहाल सुनवाई टलने के कारण मामले में किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया है।
17 नवंबर की सुनवाई क्यों होगी अहम?
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्वाचन आयोग के जवाबी हलफनामे पर अपना पक्ष रखने के लिए 10 दिन का समय दिया है। अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होने की संभावना है। उस दौरान याचिकाकर्ता का प्रत्युत्तर, निर्वाचन आयोग की दलीलें और संबंधित दस्तावेज आगे की कार्यवाही में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोपों, SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलाव और निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रणाली से जुड़े प्रश्नों पर विचार होना है। हालांकि, अभी अदालत की ओर से इन आरोपों पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया गया है।
फिलहाल सुनवाई स्थगित होने से मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया का इंतजार बढ़ गया है। अगली सुनवाई में दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड के आधार पर यह स्पष्ट हो सकेगा कि अदालत इन मुद्दों पर किस दिशा में आगे बढ़ती है।
