पूर्णिया से सांसद Pappu Yadav की सुरक्षा को लेकर चल रहा विवाद अब बड़ा राजनीतिक और कानूनी मुद्दा बन गया है। पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए पप्पू यादव की Y+ सुरक्षा फिर से बहाल करने का आदेश दिया है। अदालत ने साफ कहा कि सरकार किसी की सुरक्षा से जुड़ा फैसला “मनमाने तरीके” से नहीं ले सकती, खासकर तब जब मामला किसी व्यक्ति के जीवन और सुरक्षा से जुड़ा हो।

दरअसल, बिहार सरकार ने सितंबर 2025 में पप्पू यादव की Y+ सुरक्षा को घटाकर Y कैटेगरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ सांसद ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।


पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति Jitendra Kumar ने 14 मई 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि सरकार के हर फैसले के पीछे ठोस कारण और तय कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए। कोर्ट ने पाया कि सुरक्षा घटाने से पहले न तो कोई नया खतरे का आकलन किया गया और न ही पप्पू यादव से कोई इनपुट लिया गया। हैरानी की बात यह भी रही कि सुरक्षा कम करने का आदेश उन्हें आधिकारिक रूप से बताया तक नहीं गया था।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी कार्यपालिका का फैसला कानून और संविधान के दायरे में होना चाहिए, न कि अधिकारियों की मनमर्जी से। अदालत ने माना कि सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता और प्रक्रिया का पालन बेहद जरूरी है।


मामला इतना गंभीर हो गया था कि पप्पू यादव को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा। बताया गया कि हाईकोर्ट में लंबे समय तक सुनवाई नहीं होने के बाद उन्होंने सर्वोच्च अदालत का रुख किया। बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पटना हाईकोर्ट में लगातार तीन दिनों तक विस्तार से सुनवाई हुई। इसके बाद अदालत ने बिहार सरकार के 23 सितंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने सिर्फ सुरक्षा बहाल करने का आदेश ही नहीं दिया, बल्कि बिहार सरकार के गृह सचिव को नया “थ्रेट असेसमेंट” यानी खतरे का दोबारा आकलन करने का निर्देश भी दिया है। Court ने कहा कि इस प्रक्रिया में पप्पू यादव और सुरक्षा एजेंसियों दोनों की राय ली जाए और उसके बाद कानून के मुताबिक तर्कसंगत फैसला लिया जाए।


इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। विपक्ष इसे सरकार की बड़ी फजीहत बता रहा है, जबकि पप्पू यादव के समर्थक इसे “सच और संविधान की जीत” कह रहे हैं। उनकी तरफ से पैरवी कर रहे अधिवक्ता Kanishk Arora ने कहा कि यह फैसला सिर्फ एक नेता की सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी मिसाल है।

पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है क्या किसी व्यक्ति की सुरक्षा से जुड़े फैसले सिर्फ फाइलों और अधिकारियों की राय से लिए जा सकते हैं, या फिर उसमें पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी है? पटना हाईकोर्ट के इस फैसले ने फिलहाल इस बहस को और तेज कर दिया है।