दुनिया की अर्थव्यवस्था जब भी किसी बड़े संकट से गुजरती है चाहे वह श्रीलंका का आर्थिक पतन हो, पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा संकट हो या अर्जेंटीना का कर्ज संकट तब सबसे पहले जिस वैश्विक संस्था का नाम सामने आता है, वह है अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष IMF को आमतौर पर दुनिया की अर्थव्यवस्था का “इमरजेंसी फंड” माना जाता है, जो मुश्किल में फँसे देशों को कर्ज, आर्थिक सलाह और सुधारों का रोडमैप देता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि IMF के पास इतना पैसा आता कहाँ से है और यह कर्ज का पूरा सिस्टम चलाता कैसे है।
IMF की फंडिंग का सबसे बड़ा स्रोत उसके 190 सदस्य देश हैं। हर देश अपनी आर्थिक क्षमता, GDP, विदेशी व्यापार और वैश्विक भूमिका के हिसाब से IMF को एक तय राशि देता है, जिसे “कोटा” कहा जाता है। जितनी बड़ी अर्थव्यवस्था, उतना बड़ा कोटा और उतनी ही ज्यादा उस देश की ताकत IMF के भीतर। इसी कोटा फंड से IMF का मुख्य खजाना बनता है, जिसे बाद में संकटग्रस्त देशों को कर्ज के रूप में दिया जाता है। अगर कभी वैश्विक संकट के कारण IMF के पास पैसा कम पड़ जाए, तो यह अतिरिक्त फंड भी जुटा सकता है जैसे “NAB” या द्विपक्षीय उधारी समझौते जहाँ अमीर देश IMF को पैसा उधार देते हैं ताकि वह जरूरतमंद देशों की मदद कर सके।
किसी देश को IMF से कर्ज तभी मिलता है जब वह खुद IMF के पास मदद की अपील करता है। इसके बाद IMF की एक टीम उस देश की पूरी आर्थिक सेहत की जाँच करती है विदेशी मुद्रा भंडार, महंगाई, बजट घाटा, विदेशी कर्ज, बैंकिंग सिस्टम, व्यापार घाटा सबकी गहरी जांच होती है। इस जांच के बाद IMF और संबंधित देश के बीच एक “स्टाफ लेवल एग्रीमेंट” बनता है, जिसमें तय होता है कि देश को कितना कर्ज मिलेगा और बदले में कौन-कौन से सुधार करने होंगे।
IMF की सबसे बड़ी आलोचना भी इसी हिस्से से जुड़ी है, क्योंकि IMF कर्ज बिना शर्त नहीं देता। यह देश से वादे करवाता है जैसे सब्सिडी कम करना, टैक्स सिस्टम दुरुस्त करना, सरकारी खर्च नियंत्रित करना, भ्रष्टाचार-रोधी नियम लागू करना या घाटा कम करना। IMF का तर्क है कि ये कदम देश को आर्थिक रूप से स्थिर बनाते हैं, जबकि विरोधियों का कहना है कि आम जनता को इसका बोझ उठाना पड़ता है।
कर्ज को मंजूरी IMF के बोर्ड द्वारा दी जाती है, जिसमें सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि होते हैं। मंजूरी मिलने के बाद पैसा एक साथ नहीं मिलता, बल्कि किस्तों में दिया जाता है। हर किस्त तभी जारी होती है जब देश IMF को यह दिखा दे कि वह सुधारों पर आगे बढ़ रहा है। अगर देश सुधारों से पीछे हटे, तो किस्त रोक दी जाती है।
IMF अलग-अलग देशों को उनकी जरूरत के हिसाब से कई तरह की फंडिंग देता है। कोई देश तात्कालिक संकट में हो तो उसे रैपिड फाइनेंसिंग इंस्ट्रूमेंट दिया जाता है, जबकि लंबे समय वाले सुधारों के लिए एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी। बहुत गरीब देशों के लिए IMF कम ब्याज या ज़ीरो ब्याज वाला कर्ज भी उपलब्ध कराता है।
IMF का पूरा मकसद यह है कि कोई भी देश ऐसी आर्थिक स्थिति में न पहुँचे जहाँ उसका संकट दुनिया की बाकी अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर दे। इसलिए IMF एक तरह से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जाल की तरह काम करता है जो उन देशों को सहारा देता है जिनकी अर्थव्यवस्था गिरने की कगार पर होती है।
सार यह है कि IMF का पैसा सदस्य देशों से आता है, लेकिन उसका उपयोग उन देशों को बचाने में किया जाता है जो आर्थिक मुश्किल में फँस जाते हैं। बदले में IMF उनसे ऐसे सुधार करवाता है जो भविष्य में अर्थव्यवस्था को मजबूत बना सकें। यही वजह है कि IMF आज भी वैश्विक वित्तीय स्थिरता की सबसे प्रभावशाली संस्था माना जाता है
