सनी देओल और अक्षय खन्ना जैसे अनुभवी कलाकारों से सजी फिल्म 'इक्का' (Ikka) एक कोर्टरूम थ्रिलर और मर्डर मिस्ट्री के रूप में दर्शकों के सामने आती है। निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने फिल्म में सस्पेंस, कानूनी लड़ाई, पारिवारिक भावनाओं और सत्ता के खेल को एक साथ जोड़ने की कोशिश की है। हालांकि, मजबूत स्टार कास्ट और दिलचस्प विषय होने के बावजूद फिल्म अपनी कहानी और स्क्रीनप्ले के कारण वह प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पाती, जिसकी दर्शकों को उम्मीद रहती है।


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फिल्म: इक्का (Ikka)

निर्देशक: सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा

कलाकार: सनी देओल, अक्षय खन्ना, आकांक्षा रंजन कपूर और अन्य

रेटिंग: 2.5/5


फिल्म की शुरुआत काफी रहस्यमय अंदाज में होती है। सोमा (आकांक्षा रंजन कपूर) को शौर्यमान (अक्षय खन्ना) के साथ नाइट आउट के दौरान दिखाया जाता है, लेकिन कुछ ही देर बाद उसे एक तेज रफ्तार लग्जरी कार से बाहर फेंक दिया जाता है। गंभीर रूप से घायल सोमा का मामला धीरे-धीरे राजनीति, प्रभावशाली लोगों और न्याय व्यवस्था के बीच फंस जाता है। यहीं से कहानी एक कोर्टरूम ड्रामा का रूप लेती है।


इसके बाद कहानी में प्रवेश होता है अर्जुन (सनी देओल) का, जो एक प्रतिष्ठित डिफेंस लॉयर हैं। अदालत में उनका किरदार ईमानदारी और न्याय के पक्ष में मजबूती से खड़ा नजर आता है। अर्जुन अपने शुरुआती तर्कों में यह सवाल उठाते हैं कि किस तरह ताकत और सामाजिक हैसियत कई बार न्याय की दिशा तय करने लगती है। फिल्म का संवाद "कानून और न्याय हमेशा एक जैसे नहीं होते" इसकी मूल सोच को सामने रखने का प्रयास करता है।


मुख्य कहानी के साथ-साथ अर्जुन के निजी जीवन को भी समानांतर रूप से दिखाया गया है। उनकी बेटी, जो एक प्रतिभाशाली तैराक है, चयन ट्रायल के दौरान गंभीर रूप से बीमार पड़ जाती है। डॉक्टर इलाज के लिए स्टेम सेल की जरूरत बताते हैं और यही परिस्थिति अर्जुन को ऐसे केस की पैरवी करने के लिए मजबूर करती है, जिसे वह पहले स्वीकार करने से इनकार कर चुके थे। इसके बाद अदालत में व्यक्तिगत भावनाओं और कानूनी सबूतों के बीच संघर्ष शुरू होता है।


फिल्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा तब सामने आता है, जब अर्जुन एक कथित दुष्कर्म आरोपी का बचाव करते हैं। हालांकि, वह अदालत में पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाने का विरोध करते हैं। यह हिस्सा कहीं न कहीं सनी देओल की चर्चित फिल्म 'दामिनी' की याद दिलाता है। कोर्टरूम में उनका आक्रामक अंदाज और संवाद अदायगी पुराने दौर के दर्शकों को जरूर आकर्षित कर सकती है।

अक्षय खन्ना अपने किरदार में प्रभावशाली दिखते हैं, लेकिन उनका अभिनय कई जगह उनके पुराने नकारात्मक किरदारों की याद दिलाता है। उनका हावभाव, संवाद बोलने का अंदाज और स्क्रीन प्रेजेंस प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन किरदार में नया प्रयोग कम नजर आता है। मेकर्स ने उनके पुराने स्क्रीन इमेज को दोहराने की कोशिश की है, जो हर दर्शक को प्रभावित नहीं कर पाती।


निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने फिल्म में कई बड़े ट्विस्ट और रहस्य जोड़ने का प्रयास किया है। हालांकि, कहानी आगे बढ़ने के साथ अधिकांश मोड़ पहले से अनुमानित लगने लगते हैं। क्लाइमैक्स को चौंकाने वाला बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन अनुभवी दर्शक अंत का अंदाजा पहले ही लगा सकते हैं। यही वजह है कि फिल्म का सस्पेंस अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाता।


स्क्रीनप्ले फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आता है। कोर्टरूम ड्रामा, मर्डर मिस्ट्री, पारिवारिक भावनाएं और सामाजिक संदेश जैसे कई विषयों को एक साथ समेटने की कोशिश में कहानी अपना फोकस खो देती है। कई दृश्य प्रभावशाली होने के बावजूद पूरी फिल्म एक संतुलित और मजबूत थ्रिलर का रूप नहीं ले पाती।


तकनीकी पक्ष की बात करें तो फिल्म का निर्माण स्तर अच्छा है और कोर्टरूम से जुड़े दृश्य प्रभावी ढंग से फिल्माए गए हैं। कलाकारों का अभिनय भी कहानी को संभालने की पूरी कोशिश करता है, लेकिन कमजोर लेखन और अनुमानित घटनाक्रम इसकी सबसे बड़ी बाधा बन जाते हैं।


कुल मिलाकर 'इक्का' एक ऐसी कोर्टरूम थ्रिलर है, जिसमें दमदार कलाकार, अच्छा विषय और कई दिलचस्प विचार मौजूद हैं, लेकिन कमजोर पटकथा और पुराने अंदाज की कहानी इसकी रफ्तार को धीमा कर देती है। यदि आप सनी देओल के अदालत वाले दमदार अवतार और अक्षय खन्ना के नकारात्मक किरदारों के प्रशंसक हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है। हालांकि, यदि आप नई सोच और अप्रत्याशित मोड़ों वाली आधुनिक कोर्टरूम थ्रिलर की उम्मीद लेकर जाएंगे, तो यह फिल्म शायद आपकी अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी न उतरे।