नई दिल्ली। नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को एक बार फिर सामने ला दिया है। अचानक आई बाढ़, भूस्खलन और तेज जलप्रवाह ने भारी तबाही मचाई है। इसी के बीच अब चीन की ओर से तिब्बत में बनाई जा रही दुनिया की विशाल जलविद्युत परियोजना को लेकर भारत की चिंता भी बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में इस संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप, भूस्खलन या अन्य प्राकृतिक आपदा होती है और उसके कारण भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर पहुंचता है, तो अरुणाचल प्रदेश और असम सहित पूर्वोत्तर भारत के बड़े हिस्से पर गंभीर असर पड़ सकता है।
नेपाल की बाढ़ के बीच चीन के विशाल बांध ने बढ़ाई चिंता
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में बड़े जल संसाधन और जलविद्युत प्रोजेक्ट भविष्य में कितने बड़े जोखिम का कारण बन सकते हैं। इसी संदर्भ में तिब्बत के मेडॉग क्षेत्र में चीन की ओर से विकसित की जा रही विशाल जलविद्युत परियोजना चर्चा के केंद्र में आ गई है। परियोजना का आकार और इसका स्थान दोनों ही इसे रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता इसलिए है क्योंकि ब्रह्मपुत्र की ऊपरी धारा चीन के नियंत्रण वाले तिब्बती क्षेत्र से होकर गुजरती है और आगे भारत में प्रवेश करती है।
ब्रह्मपुत्र पर बन रहा है चीन का विशाल प्रोजेक्ट
चीन तिब्बत के मेडॉग क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी धारा पर करीब 60 हजार मेगावाट क्षमता की विशाल जलविद्युत परियोजना विकसित कर रहा है। तिब्बत में ब्रह्मपुत्र को यारलुंग त्सांगपो के नाम से जाना जाता है। यही नदी भारत में अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने के बाद सियांग और आगे चलकर असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से बहती है। यही भौगोलिक स्थिति भारत के लिए इस परियोजना को बेहद संवेदनशील बनाती है।
इतनी बड़ी परियोजना के कारण भारत की चिंता केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। सवाल नदी के पानी के प्रवाह, जल संबंधी आंकड़ों और भविष्य में चीन के बढ़ते जल नियंत्रण को लेकर भी है। भारी बारिश के दौरान यदि ऊपरी क्षेत्र से अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आता है तो बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। वहीं दूसरी ओर पानी के प्रवाह में कमी का असर खेती और स्थानीय जल संसाधनों पर पड़ सकता है।
हिमालय की भूकंपीय जमीन ने बढ़ाई आशंका
मेडॉग क्षेत्र भौगोलिक और भूगर्भीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। हिमालय दुनिया की सक्रिय भूकंपीय पर्वतमालाओं में शामिल है। यहां भूकंप के साथ भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बना रहता है। इसी वजह से इतनी विशाल परियोजना को लेकर पर्यावरण और सुरक्षा से जुड़े सवाल लगातार उठते रहे हैं।
हाल में सामने आए कुछ भूवैज्ञानिक अध्ययनों ने भी इस क्षेत्र की भूगर्भीय सक्रियता पर ध्यान आकर्षित किया है। रिपोर्टों में परियोजना के आसपास मौजूद सक्रिय भूगर्भीय संरचनाओं को लेकर चर्चा की गई है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में बांध निश्चित रूप से टूटेगा या भारत में जलप्रलय आएगा। खतरे का वास्तविक आकलन भूकंपीय स्थिति, बांध की संरचना, जलाशय प्रबंधन और प्राकृतिक परिस्थितियों सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।
विशेषज्ञों ने क्यों बताया ‘वॉटर बम’
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी और पूर्व राजदूत राजीव डोगरा ने चीन की इस परियोजना को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि हिमालय के अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में इतनी विशाल जलविद्युत परियोजना भविष्य में भारत के लिए रणनीतिक और जल सुरक्षा की चुनौती बन सकती है।
ब्रह्मा चेलानी ने चीन की इस परियोजना को हिमालय के भूकंपीय क्षेत्र में स्थित संभावित ‘वॉटर बम’ के तौर पर बताया है। वहीं राजीव डोगरा ने भी आशंका व्यक्त की है कि परियोजना पूरी होने के बाद भारत के पूर्वोत्तर हिस्से पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों के ये बयान संभावित जोखिम को लेकर चेतावनी हैं, इन्हें किसी निश्चित भविष्य की आपदा की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता।
भारत की चिंता सिर्फ बाढ़ नहीं, पानी पर नियंत्रण को लेकर भी
भारत और चीन के बीच ब्रह्मपुत्र नदी के पानी को लेकर व्यापक जल बंटवारा संधि नहीं है। ऐसे में नदी के जलप्रवाह और उससे जुड़े आंकड़ों की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत के लिए यह जानना जरूरी है कि ऊपरी धारा में पानी की स्थिति क्या है और अचानक जलप्रवाह बढ़ने की स्थिति में निचले इलाकों को कितनी जल्दी चेतावनी दी जा सकती है।
ब्रह्मपुत्र पर चीन का बढ़ता नियंत्रण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नदी अरुणाचल प्रदेश और असम के बड़े भूभाग की जीवनरेखा है। नदी के जलप्रवाह में अचानक बदलाव का असर बाढ़, नदी कटाव, कृषि और स्थानीय आबादी पर पड़ सकता है।
नेपाल की तबाही ने क्यों बढ़ा दी चिंता
नेपाल में हालिया भीषण बाढ़ ने हिमालयी नदियों से जुड़े खतरों की गंभीरता को फिर सामने ला दिया है। पहाड़ों में ग्लेशियर, बर्फ, चट्टानों और अत्यधिक बारिश के कारण कुछ ही समय में नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। कई बार भूस्खलन नदी के प्रवाह को रोक देता है और बाद में पानी का दबाव बढ़ने पर अचानक तेज बाढ़ की स्थिति बन सकती है।
इसी वजह से विशेषज्ञ यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि भविष्य में ब्रह्मपुत्र की ऊपरी धारा में कोई बड़ी प्राकृतिक घटना होती है तो उसका प्रभाव भारत के निचले क्षेत्रों तक कितनी तेजी से पहुंच सकता है। हालांकि नेपाल की हालिया बाढ़ और चीन की मेडॉग परियोजना के बीच सीधे तौर पर कोई कारणात्मक संबंध स्थापित नहीं हुआ है।
अरुणाचल और असम पर क्यों होगी सबसे पहले नजर
ब्रह्मपुत्र भारत में अरुणाचल प्रदेश से प्रवेश करती है और इसके बाद असम से होकर बहती है। इसलिए नदी के जलप्रवाह में किसी बड़े बदलाव का शुरुआती प्रभाव इन्हीं क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है। असम पहले से ही ब्रह्मपुत्र की बाढ़ और नदी कटाव की गंभीर समस्या से जूझता रहा है।
ऐसे में यदि ऊपरी क्षेत्र में किसी प्राकृतिक आपदा के कारण अचानक अत्यधिक जलप्रवाह पैदा होता है तो समय पर चेतावनी और सुरक्षित निकासी बेहद महत्वपूर्ण हो जाएगी। भारत के लिए उपग्रह निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, नदी जलस्तर की लगातार निगरानी और सीमावर्ती क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन व्यवस्था मजबूत करना अहम होगा।
चीन की परियोजना के जवाब में भारत भी तैयार कर रहा बड़ा प्रोजेक्ट
चीन की विशाल परियोजना के बीच भारत अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर करीब 11 हजार मेगावाट क्षमता की सियांग ऊपरी बहुउद्देश्यीय परियोजना को आगे बढ़ा रहा है। भारत के लिए यह परियोजना बिजली उत्पादन के साथ-साथ जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारत की योजना है कि सियांग नदी पर विकसित होने वाला यह बड़ा ढांचा भविष्य में जलप्रवाह को नियंत्रित करने और अचानक आने वाले अत्यधिक पानी के प्रभाव को कम करने में मदद कर सके। हालांकि किसी भी बांध को हर प्रकार की प्राकृतिक आपदा से पूरी तरह सुरक्षित मानना सही नहीं होगा। इसकी वास्तविक उपयोगिता परियोजना के निर्माण, संचालन और आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
क्या सच में नेपाल से भी बड़ी तबाही का खतरा है?
यह सवाल बेहद गंभीर है, लेकिन इसका जवाब फिलहाल निश्चित रूप से नहीं दिया जा सकता। चीन की परियोजना का आकार बहुत बड़ा है और इसका निर्माण भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में हो रहा है, इसलिए संभावित जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह कहना कि बांध टूटते ही भारत में नेपाल से भी बड़ी तबाही निश्चित रूप से आएगी, अभी एक प्रमाणित तथ्य नहीं बल्कि आशंका है।
असल चुनौती यह है कि भारत भविष्य में किसी भी संभावित प्राकृतिक या मानवजनित संकट के लिए कितना तैयार है। नदी के जलप्रवाह की निगरानी, समय पर सूचना, वैज्ञानिक अध्ययन, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और सीमावर्ती इलाकों में मजबूत आपदा प्रबंधन ही किसी बड़ी त्रासदी के असर को कम कर सकते हैं।
अब नजर सिर्फ बांध पर नहीं, हिमालय के बदलते खतरे पर भी
नेपाल की बाढ़ ने यह दिखा दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक घटनाएं कितनी तेजी से बड़ी आपदा में बदल सकती हैं। दूसरी तरफ चीन की विशाल जलविद्युत परियोजना ने भारत के सामने जल सुरक्षा और रणनीतिक चुनौती को और गंभीर बना दिया है।
मेडॉग परियोजना को लेकर सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि बांध कितना बड़ा है, बल्कि यह है कि इतने संवेदनशील क्षेत्र में इतनी विशाल परियोजना का भविष्य में नदी के प्राकृतिक प्रवाह, पर्यावरण और निचले क्षेत्रों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। भारत के लिए फिलहाल सबसे जरूरी है कि वह आशंकाओं से आगे बढ़कर वैज्ञानिक निगरानी, जल आंकड़ों की पारदर्शिता और मजबूत आपदा तैयारी पर ध्यान दे। क्योंकि हिमालय में खतरा कब और किस रूप में सामने आएगा, यह कोई नहीं बता सकता—लेकिन उसके लिए तैयारी आज से जरूर की जा सकती है।
